गुस्सा क्यों आता है? जानिए इसके कारण, नुकसान और गुस्से को कंट्रोल करने के सबसे प्रभावी तरीके

क्या आपको भी छोटी-छोटी बातों पर बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है? क्या कभी किसी छोटी-सी बात पर आपका धैर्य टूट गया और बाद में लगा कि इतनी-सी बात पर गुस्सा नहीं करना चाहिए था?

अगर आपका जवाब हाँ है, तो आप अकेले नहीं हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग गुस्से की समस्या से जूझ रहे हैं। कोई ट्रैफिक में गुस्सा करता है, कोई घर में, तो कोई ऑफिस में। कई बार तो हमें खुद भी समझ नहीं आता कि आखिर हमें इतनी जल्दी गुस्सा क्यों आ जाता है।

इसलिए दोस्तों, आज इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि गुस्सा क्यों आता है, इसके पीछे क्या कारण होते हैं, यह हमारे शरीर और रिश्तों को कैसे प्रभावित करता है और सबसे महत्वपूर्ण, गुस्से को नियंत्रित करने के ऐसे तरीके जिन्हें आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से अपना सकते हैं।


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गुस्सा क्या है?

गुस्सा (Anger) एक स्वाभाविक भावनात्मक प्रतिक्रिया है। जब हमें लगता है कि हमारे साथ गलत हो रहा है, कोई हमारा अपमान कर रहा है, हमारी बात नहीं सुनी जा रही या हमारी उम्मीदें टूट रही हैं, तब हमारे भीतर गुस्सा पैदा होता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि गुस्सा अपने आप में बुरा नहीं होता।

अगर समाज में किसी के साथ अन्याय हो रहा है और उस अन्याय के खिलाफ आपके मन में आक्रोश पैदा होता है, तो यही गुस्सा आपको सही काम करने की प्रेरणा भी दे सकता है।

लेकिन जब यही गुस्सा बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया बन जाए, तब यह विनाशकारी हो जाता है।


हमें गुस्सा क्यों आता है?

1. जब हमारी उम्मीदें टूट जाती हैं

अधिकांश लोगों के गुस्से की शुरुआत यहीं से होती है।

हम अपने मन में पहले से तय कर लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति हमारे साथ कैसा व्यवहार करेगा। लेकिन जब उसकी बातें या उसका व्यवहार हमारी उम्मीदों के विपरीत होता है, तो मन में निराशा पैदा होती है और वही निराशा धीरे-धीरे गुस्से का रूप ले लेती है।

मान लीजिए आपने अपने किसी दोस्त की हर मुश्किल समय में मदद की। अब आपको उम्मीद है कि जब आपको उसकी जरूरत होगी, तो वह भी आपका साथ देगा। लेकिन अगर वह मुकर जाए, तो सिर्फ दुख नहीं होगा, बल्कि गुस्सा भी आएगा।

इसलिए कई बार गुस्से की वजह सामने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि हमारी अपनी अपेक्षाएँ होती हैं।


2. जब हमें लगता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है

हर इंसान चाहता है कि उसके साथ न्याय हो और उसे सम्मान मिले।

लेकिन जब कोई व्यक्ति झूठ बोलता है, धोखा देता है, बेइज्जती करता है या हमारे अधिकारों का हनन करता है, तब स्वाभाविक रूप से गुस्सा पैदा होता है।

यही कारण है कि भ्रष्टाचार, भेदभाव या शोषण जैसी घटनाएँ लोगों में आक्रोश पैदा करती हैं।

यह गुस्सा गलत नहीं है, लेकिन इसे सही दिशा देना जरूरी है।


3. तनाव और मानसिक दबाव

कई बार गुस्से की असली वजह वह व्यक्ति नहीं होता, जिस पर हम चिल्ला रहे होते हैं।

असल वजह होती है—तनाव।

मान लीजिए किसी व्यक्ति पर घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, नौकरी का दबाव और कर्ज जैसी कई जिम्मेदारियाँ एक साथ हों। ऐसे में उसका दिमाग पहले से ही तनाव में रहता है।

फिर अगर कोई छोटी-सी बात भी हो जाए, तो वह सामान्य प्रतिक्रिया देने के बजाय गुस्सा कर बैठता है।

यही कारण है कि मानसिक तनाव से गुजर रहे लोग अक्सर ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं।

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4. नींद की कमी भी गुस्से का कारण बन सकती है

अगर आपने ध्यान दिया हो, तो जिस दिन आपकी नींद पूरी नहीं होती, उस दिन छोटी-छोटी बातें भी परेशान करने लगती हैं।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पर्याप्त नींद न मिलने पर हमारा मस्तिष्क भावनाओं को नियंत्रित करने में कमजोर पड़ जाता है।

इसलिए अगर आपको अक्सर बिना वजह गुस्सा आता है, तो अपने सोने-जागने की आदतों पर भी ध्यान दें।

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5. बचपन का माहौल

बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने आसपास देखते हैं।

अगर कोई बच्चा ऐसे माहौल में बड़ा होता है जहाँ हर बात पर लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज या हिंसा होती है, तो उसके मन में यह धारणा बन सकती है कि हर समस्या का समाधान गुस्से से ही होता है।

हालाँकि ऐसा हर व्यक्ति के साथ नहीं होता, लेकिन बचपन का वातावरण हमारे स्वभाव पर गहरा प्रभाव डाल सकता है


गुस्से के समय हमारे शरीर और दिमाग में क्या होता है?

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि गुस्से में आपका चेहरा लाल हो जाता है, दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है और कई बार हाथ तक काँपने लगते हैं?

ऐसा इसलिए नहीं होता कि गुस्सा सिर्फ़ मन में होता है। सच तो यह है कि गुस्से का असर पूरे शरीर पर पड़ता है।

जब आपको गुस्सा आता है, तो आपका मस्तिष्क यह मान लेता है कि सामने कोई खतरा है। इसके बाद शरीर तुरंत खुद को बचाने की तैयारी करने लगता है। आपका मस्तिष्क आपके खून में  एड्रेनालाईन (Adrenaline), नॉरएड्रेनालाईन (Noradrenaline) और कोर्टिसोल (Cortisol) नामक  हार्मोन छोड़ देता हैं। ये हार्मोन शरीर को ‘फाइट या फ्लाइट’ (लड़ो या भागो) की स्थिति के लिए तैयार करते हैं। जिसके बाद, दिल तेजी से खून पंप करता है, साँसें तेज़ हो जाती हैं और शरीर में ऊर्जा बढ़ जाती है।

इसी वजह से गुस्से में कई लोग बिना सोचे-समझे बोल देते हैं या ऐसा कदम उठा लेते हैं, जिसका बाद में पछतावा होता है। जब गुस्सा शांत होता है, तब दिमाग दोबारा सामान्य तरीके से सोचने लगता है और तब एहसास होता है कि प्रतिक्रिया कुछ ज़्यादा ही हो गई।

यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि गुस्से के समय निर्णय लेने से बचना चाहिए। उस समय हमारा दिमाग समस्या का समाधान नहीं, बल्कि तुरंत प्रतिक्रिया देने की स्थिति में होता है।

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बार-बार गुस्सा करने के क्या नुकसान हैं?

कई लोग सोचते हैं कि गुस्सा निकाल देने से मन हल्का हो जाता है। कुछ मामलों में अपनी बात शांत तरीके से कहना मददगार हो सकता है, लेकिन बार-बार अनियंत्रित गुस्सा लंबे समय में नुकसान पहुँचाता है।

रिश्तों में दूरी

एक कठोर शब्द कई बार उस चोट से ज़्यादा दर्द देता है जो दिखाई देती है। परिवार, दोस्त या जीवनसाथी बार-बार गुस्से का सामना करते हैं, तो धीरे-धीरे वे आपसे खुलकर बात करना बंद कर सकते हैं।

स्वास्थ्य पर असर

लगातार तनाव और गुस्सा शरीर पर भी असर डाल सकता है। इससे रक्तचाप बढ़ने, नींद खराब होने और मानसिक तनाव बढ़ने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

सही फैसले लेने की क्षमता कम होना

गुस्से में इंसान अक्सर वही बोल देता है जो उसे नहीं बोलना चाहिए। बाद में माफी माँगने से शब्द वापस नहीं आते।


गुस्से से जुड़ी 5 सबसे बड़ी गलतफहमियाँ

गुस्से को लेकर समाज में कई ऐसी बातें प्रचलित हैं जो पूरी तरह सच नहीं हैं। इन्हीं गलत धारणाओं की वजह से लोग अपने गुस्से को समझने की बजाय उसे सही मानने लगते हैं।

1. “मेरा स्वभाव ही ऐसा है, मैं क्या करूँ?”

यह सबसे आम बहाना है।

सच यह है कि स्वभाव जन्म से तय नहीं होता, बल्कि आदतों और अनुभवों से बनता है। अगर कोई व्यक्ति गुस्सा करना सीख सकता है, तो धैर्य रखना भी सीख सकता है।

अपने स्वभाव का बहाना बनाकर बदलाव से भागना आसान है, लेकिन असली साहस खुद को बदलने में है।


2. “गुस्सा निकाल देना चाहिए, नहीं तो नुकसान होगा”

कुछ लोग मानते हैं कि जो मन में है, वह तुरंत निकाल देना चाहिए।

लेकिन सोचिए…

अगर हर बार गुस्से में जो मन आए वही बोल दिया जाए, तो कितने रिश्ते बचेंगे?

गुस्से को दबाना भी सही नहीं है और बिना सोचे-समझे निकाल देना भी सही नहीं है। सही तरीका है—पहले खुद को शांत करना, फिर अपनी बात कहना।


3. “जो ज्यादा गुस्सा करता है, वही ताकतवर होता है”

असलियत बिल्कुल उलटी है।

जो व्यक्ति हर छोटी बात पर अपना आपा खो देता है, वह अपनी भावनाओं का गुलाम है।

ताकतवर वह नहीं जो दूसरों को डरा दे, बल्कि वह है जो उकसाने के बाद भी अपने शब्दों और व्यवहार पर नियंत्रण रख सके।


4. “सिर्फ सामने वाला ही मेरी परेशानी की वजह है”

यह बात हर बार सही नहीं होती।

कई बार हमारी थकान, तनाव, अधूरी नींद या मन की परेशानियाँ भी गुस्से का कारण होती हैं।

अगर हम हर गलती का दोष सिर्फ दूसरों को देंगे, तो अपने भीतर झाँकने का मौका ही नहीं मिलेगा।


5. “समय के साथ गुस्सा अपने आप ठीक हो जाएगा”

अगर गुस्सा सिर्फ एक-दो दिन की बात है, तो शायद ऐसा हो।

लेकिन अगर सालों से यही आदत है, तो बिना प्रयास के बदलाव मुश्किल है।

जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम करना पड़ता है, वैसे ही मन को शांत रखने के लिए भी रोज़ थोड़ा अभ्यास करना पड़ता है।


खुद से ये 5 सवाल जरूर पूछिए

जीवन में ऐसे लोग बहुत मिलेंगे जो आपको गुस्सा दिलाएँगे।

कोई आपकी आलोचना करेगा, कोई आपका अपमान करेगा, कोई आपका भरोसा तोड़ेगा और कोई आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरेगा।

आप हर व्यक्ति को नहीं बदल सकते।

लेकिन एक व्यक्ति ऐसा है जिसे आप बदल सकते हैं…

वह हैं—आप खुद।

जिस दिन आपने अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण करना सीख लिया, उसी दिन से आपकी आधी समस्याएँ अपने आप कम होने लगेंगी।

इसलिए अगर आप सच में अपने गुस्से पर काम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले इन सवालों के जवाब लिखिए।

  • मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा किन परिस्थितियों में आता है?
  • क्या मेरा गुस्सा समस्या का समाधान करता है या उसे और बढ़ा देता है?
  • गुस्से की वजह से मैंने अब तक क्या-क्या खोया है?
  • अगर मैं थोड़ा शांत रहता, तो क्या परिणाम अलग हो सकता था?
  • मैं आज से कौन-सी एक आदत बदल सकता हूँ?

इन सवालों के जवाब शायद कोई और आपको न दे पाए, लेकिन आप खुद को जरूर दे सकते हैं।

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गुस्से को कैसे कंट्रोल करें? 10 ऐसे तरीके जो सच में काम आते हैं

गुस्से को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, और इसकी जरूरत भी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि गुस्सा आपके नियंत्रण में रहे, न कि आप गुस्से के नियंत्रण में।

आइए जानते हैं कुछ ऐसे तरीके जिन्हें मनोवैज्ञानिक भी उपयोगी मानते हैं और जिन्हें आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अपना सकते हैं।


1. सबसे पहले गुस्से की वजह पहचानिए

अधिकांश लोग सिर्फ इतना जानते हैं कि उन्हें गुस्सा आ गया, लेकिन यह नहीं समझते कि आखिर क्यों आया।

कई बार जिस बात पर हम गुस्सा कर रहे होते हैं, वह असली कारण नहीं होता।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए ऑफिस में आपका दिन बहुत खराब गया। बॉस ने डाँट दिया, काम का दबाव भी बहुत था। शाम को घर पहुँचे और बच्चे ने गलती से पानी का गिलास गिरा दिया। अचानक आप उस पर चिल्ला पड़े।

क्या सच में आपको गिलास गिरने पर गुस्सा आया था?

शायद नहीं।

असल वजह पूरे दिन का तनाव था, जो बच्चे पर निकल गया।

इसलिए जब भी गुस्सा आए, खुद से एक सवाल जरूर पूछिए—

“क्या मैं इस समय जिस बात पर गुस्सा कर रहा हूँ, वही असली कारण है?”

कई बार इस सवाल का जवाब ही आपका गुस्सा आधा कर देता है।


2. जवाब देने से पहले कुछ सेकंड रुकिए

गुस्से की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह हमें तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाता है।

यही वह समय होता है जब लोग ऐसे शब्द बोल देते हैं जिन्हें वे बाद में वापस लेना चाहते हैं।

इसलिए खुद को एक छोटी-सी आदत सिखाइए।

जब भी बहुत गुस्सा आए, तुरंत जवाब देने की बजाय 10–20 सेकंड रुक जाइए।

अगर संभव हो तो दो-तीन गहरी साँस लीजिए।

हो सकता है समस्या खत्म न हो, लेकिन आपकी प्रतिक्रिया जरूर बदल जाएगी।


3. हर बात को अपनी इज्जत का सवाल मत बनाइए

कई लोगों को इसलिए ज्यादा गुस्सा आता है क्योंकि वे हर छोटी बात को अपने सम्मान से जोड़ लेते हैं।

किसी ने आपकी बात नहीं मानी…

किसी ने आपकी तारीफ नहीं की…

किसी ने आपकी सलाह नहीं मानी…

और आपको लगा कि आपका अपमान हो गया।

लेकिन सच यह है कि हर असहमति, अपमान नहीं होती।

कई बार सामने वाला व्यक्ति सिर्फ अलग सोच रखता है।

अगर हम हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेना बंद कर दें, तो आधे झगड़े अपने आप खत्म हो जाते हैं।


4. अपनी बात कहना सीखिए, दबाना नहीं

कुछ लोग गुस्सा करते हैं, जबकि कुछ लोग गुस्सा दबाते रहते हैं।

दोनों ही तरीके सही नहीं हैं।

अगर कोई बात आपको बार-बार परेशान कर रही है, तो सही समय पर, शांत भाषा में अपनी बात कहिए।

“तुम हमेशा ऐसा करते हो” कहने की बजाय,

“जब ऐसा होता है, तो मुझे बुरा लगता है।”

इस तरह बात करने से सामने वाला आपकी बात समझने की कोशिश करता है, बचाव की मुद्रा में नहीं आता।


5. अपने शरीर का भी ध्यान रखिए

कई लोग सिर्फ मानसिक कारणों पर ध्यान देते हैं, लेकिन शरीर भी हमारे स्वभाव को प्रभावित करता है।

अगर आप लगातार कम सो रहे हैं, ठीक से खाना नहीं खा रहे, हर समय थके हुए रहते हैं या बिल्कुल भी व्यायाम नहीं करते, तो चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।

इसलिए रोज़ थोड़ी-सी सैर, पर्याप्त नींद और संतुलित भोजन भी गुस्से को कम करने में मदद कर सकते हैं।

ध्यान और योग करना भी गुस्से को कंट्रोल करने में काफी लाभदायक साबित होता है |

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6. क्या हर गुस्सा गलत होता है?

नहीं।

अगर किसी के साथ अन्याय हो रहा है, किसी कमजोर व्यक्ति पर अत्याचार हो रहा है या समाज में कोई गंभीर गलत काम हो रहा है, तो उसके खिलाफ आवाज़ उठाना गलत नहीं है।

लेकिन फर्क यह है कि आवाज़ उठाना और अपना आपा खो देना—दो अलग बातें हैं।

गुस्सा अगर विवेक के साथ हो, तो वह बदलाव की ताकत बन सकता है।

लेकिन अगर गुस्सा विवेक को ही खत्म कर दे, तो वही गुस्सा नुकसान का कारण बन जाता है।

क्या धर्मग्रंथ भी गुस्से से बचने की सलाह देते हैं?

हाँ।

लगभग हर धर्म और दर्शन ने अनियंत्रित क्रोध को मनुष्य का शत्रु माना है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्रोध से मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है। जब बुद्धि सही निर्णय लेना बंद कर देती है, तो व्यक्ति ऐसे काम कर बैठता है जिनका उसे बाद में पछतावा होता है।

इसका मतलब यह नहीं कि कभी गुस्सा ही न करें, बल्कि यह कि गुस्से को अपने विवेक पर हावी न होने दें।

महात्मा बुद्ध भी कहा करते थे कि—

“क्रोध को पकड़े रखना ऐसा है जैसे किसी दूसरे पर फेंकने के लिए जलता हुआ अंगारा हाथ में पकड़ना। सबसे पहले आप खुद ही जलते हैं।”

यह बात आज भी उतनी ही सच है। गुस्सा सबसे पहले हमारी मानसिक शांति छीनता है, उसके बाद दूसरों को नुकसान पहुँचाता है।


एक छोटी-सी कहानी जो गुस्से का सच बताती है

एक बार एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया और बिना किसी कारण उन्हें अपशब्द कहने लगा।

बुद्ध शांत बैठे रहे।

जब वह व्यक्ति बोलते-बोलते थक गया, तब बुद्ध ने उससे पूछा,

“अगर कोई व्यक्ति आपको कोई उपहार दे और आप उसे स्वीकार न करें, तो वह उपहार किसके पास रहेगा?”

उस व्यक्ति ने कहा,

“जिसने दिया है, उसी के पास रहेगा।”

बुद्ध मुस्कुराए और बोले,

“ठीक वैसे ही, मैं तुम्हारे अपशब्द स्वीकार नहीं करता। इसलिए वे तुम्हारे ही पास रहेंगे।”

यह कहानी हमें सिखाती है कि हर उकसावे पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता। कई बार हमारी शांति ही सबसे मजबूत जवाब होती है।


कब गुस्सा एक गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है?

हर गुस्सा सामान्य नहीं होता।

अगर आपको कभी-कभी गुस्सा आता है, तो यह सामान्य बात है। लेकिन अगर—

  • छोटी-छोटी बातों पर आप अपना आपा खो देते हैं।
  • गुस्से में चीज़ें तोड़ने या किसी को नुकसान पहुँचाने का मन करता है।
  • बाद में हर बार पछतावा होता है, लेकिन फिर वही दोहराते हैं।
  • आपके रिश्ते, नौकरी या परिवार पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।

तो इसे केवल “मेरा स्वभाव ऐसा ही है” कहकर टालना ठीक नहीं है।

ऐसी स्थिति में किसी मनोवैज्ञानिक (Psychologist) या मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से सलाह लेना मददगार हो सकता है। सही समय पर मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।


निष्कर्ष

गुस्सा हमारा दुश्मन नहीं है। यह हमारे मन का एक संकेत है कि कहीं न कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो हमें परेशान कर रहा है।

समस्या तब शुरू होती है, जब हम उस संकेत को समझने की बजाय गुस्से के बहाव में बह जाते हैं।

अगली बार जब आपको गुस्सा आए, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले एक पल रुककर खुद से पूछिए—

“मैं सच में किस बात से परेशान हूँ?”

हो सकता है, इस एक सवाल का जवाब ही आपका गुस्सा शांत कर दे।

याद रखिए, दूसरों पर जीत हासिल करना आसान है, लेकिन अपने गुस्से पर जीत हासिल करना ही असली सफलता है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

(1) क्या गुस्सा पूरी तरह खत्म किया जा सकता है?

नहीं। गुस्से को दबाने से भी नुकसान हो सकता है। बेहतर है कि सही समय पर, शांत भाषा में अपनी बात रखें।

(2) क्या गुस्सा दबाना सही है?

नहीं। गुस्से को दबाने से भी नुकसान हो सकता है। बेहतर है कि सही समय पर, शांत भाषा में अपनी बात रखें।

(3) क्या योग और ध्यान सच में मदद करते हैं?

हाँ, नियमित ध्यान, योग और साँसों के अभ्यास तनाव कम करने और भावनाओं को बेहतर ढंग से संभालने में सहायक हो सकते हैं।

(4) क्या कम नींद से भी गुस्सा बढ़ सकता है?

हाँ। पर्याप्त नींद न मिलने पर धैर्य और भावनात्मक नियंत्रण प्रभावित हो सकते हैं, जिससे चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ सकता है।

तो दोस्तों, आगे से जब आपको गुस्सा आए, उसे दबाने की कोशिश मत कीजिए। पहले उसे समझिए। क्योंकि जिस दिन आप अपने गुस्से की जड़ पहचान लेंगे, उसी दिन से उस पर आपका नियंत्रण भी शुरू हो जाएगा।

याद रखिए—

“दूसरों का व्यवहार आपके हाथ में नहीं है, लेकिन उनके व्यवहार पर आपकी प्रतिक्रिया हमेशा आपके हाथ में होती है।”

अगर आप हर बार प्रतिक्रिया देने से पहले सिर्फ़ 10 सेकंड रुकना सीख गए, तो हो सकता है आपकी जिंदगी के कई झगड़े शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएँ।

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dinesh neer Avatar

 

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