मोदी सरकार के 20 सबसे विवादित फैसले और घटनाएँ क्या हैं?
यह उन प्रमुख नीतियों, सरकारी निर्णयों और घटनाओं का संकलन है, जिन पर 2014 से 2026 के बीच व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस हुई। इस लेख में प्रत्येक विषय पर आलोचकों के तर्क, सरकार का पक्ष और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तब करोड़ों लोगों ने उनसे बड़ी उम्मीदें लगाई थीं|
भ्रष्टाचार पर लगाम, तेज़ आर्थिक विकास, युवाओं के लिए रोजगार, बेहतर बुनियादी ढाँचा और भारत को वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान दिलाने जैसे कई वादों के साथ उनकी सरकार सत्ता में आई।
पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए, जिनकी देश और विदेश में सराहना भी हुई। डिजिटल इंडिया, UPI, सड़क और एक्सप्रेसवे निर्माण, रेलवे के आधुनिकीकरण और कई कल्याणकारी योजनाओं को सरकार की बड़ी उपलब्धियों के रूप में देखा जाता है।
लेकिन विपक्षी दलों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र संगठनों और कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सरकार की कई नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कुछ फैसले जल्दबाज़ी में लिए गए, कुछ नीतियों का असर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा क्योंकि उनमें पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही नहीं बरती गई और कुछ मामलों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर चिंताएँ सामने आईं। दूसरी ओर, सरकार और उसके समर्थक इन आलोचनाओं से असहमत रहते हुए अपने फैसलों को आवश्यक सुधार बताते हैं।
तो दोस्तों आज हम मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल का पूरे विस्तार विश्लेषण का करने जा रहे है | यहाँ हम उन 20 प्रमुख मुद्दों को समझेंगे जिन्हें विपक्ष और राजनीतिक विशेषज्ञ मोदी शासनकाल की सबसे बड़ी गलतियाँ या विवादित निर्णय मानते हैं। इस लेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है। इसलिए जहाँ उचित होगा वहाँ सरकार का पक्ष भी रखा जाएगा, ताकि पाठक दोनों दृष्टिकोणों को समझकर अपनी राय बना सकें।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख किसी राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा के समर्थन अथवा विरोध के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल उन प्रमुख आलोचनाओं और विवादों का तथ्यपरक एवं संतुलित संकलन प्रस्तुत करना है जो सार्वजनिक विमर्श, न्यायिक कार्यवाहियों, संसदीय बहसों, सरकारी दस्तावेज़ों और विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों का हिस्सा रहे हैं।
जहाँ भी किसी विवाद, आरोप या आलोचना का उल्लेख किया गया है, वहाँ संबंधित पक्ष—सरकार, न्यायालय या अन्य संस्थाओं—का दृष्टिकोण भी शामिल करने का प्रयास किया गया है। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और पाठक के स्वतंत्र विवेक पर आधारित होना चाहिए।
1. नोटबंदी (Demonetisation) – मोदी सरकार का सबसे विवादित फैसला
8 नवंबर 2016 की रात को 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में घोषणा की कि उसी रात 12 बजे से ₹500 और ₹1000 के पुराने नोट वैध नहीं रहेंगे। उस समय प्रचलन में मौजूद लगभग 86% मुद्रा एक झटके में अमान्य हो गई। सरकार ने लोगों को पुराने नोट बैंक में जमा कराने और सीमित मात्रा में नए नोट निकालने की अनुमति दी।
सरकार ने इस निर्णय के पीछे कई उद्देश्य बताए। इनमें काले धन पर रोक लगाना, नकली नोटों के नेटवर्क को खत्म करना, आतंकवाद की फंडिंग रोकना और देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर तेज़ी से बढ़ाना प्रमुख थे।
आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?
सरकार के इस फैसले की विपक्ष, कई अर्थशास्त्रियों और स्वतंत्र विश्लेषकों ने कई आधारों पर आलोचना की।
1. लगभग पूरा पैसा वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आया
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, अमान्य किए गए नोटों का लगभग 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बैंकिंग प्रणाली में वापस जमा हो गया।
आलोचकों का कहना है कि यदि अधिकांश नकदी वापस आ गई, तो यह मानना कठिन है कि बड़ी मात्रा में काला धन नकदी के रूप में नष्ट हुआ। उनके अनुसार इससे यह धारणा कमजोर हुई कि नोटबंदी से काले धन पर निर्णायक प्रहार हुआ। जबकि सरकार को भी पता था कि देश के काले धन का अधिकांश हिस्सा स्विस बैंक में जमा था| फिर अपने देश में नोटबंदी करने का क्या तुक था |
2. छोटे व्यापार और असंगठित क्षेत्र को बड़ा झटका
भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा नकद लेन-देन पर आधारित था। छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर, किसान, कुटीर उद्योग और सूक्ष्म व्यवसाय अचानक नकदी संकट में आ गए।
कई उद्योग संगठनों और स्वतंत्र अध्ययनों में यह कहा गया कि लाखों छोटे कारोबारों की बिक्री प्रभावित हुई और कई अस्थायी रूप से बंद भी हुए।
आलोचकों का कहना है कि इस क्षेत्र को हुए नुकसान की भरपाई करने में कई महीने लगे।
3. रोजगार पर असर
कुछ श्रम और आर्थिक अध्ययनों में दावा किया गया कि नोटबंदी के बाद विशेषकर असंगठित क्षेत्र में रोजगार प्रभावित हुआ।
चूंकि निर्माण कार्य, छोटे उद्योग और नकद भुगतान पर निर्भर व्यवसायों में गतिविधियाँ धीमी हुईं, इसलिए कई श्रमिकों को अस्थायी रूप से काम छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा।
4. आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हुई
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नोटबंदी के बाद कुछ तिमाहियों में आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
नकदी की कमी के कारण उपभोग, निवेश और व्यापारिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।
हालाँकि यह भी सच है कि अर्थव्यवस्था पर उस समय वैश्विक परिस्थितियों और अन्य घरेलू कारकों का भी प्रभाव था, इसलिए केवल नोटबंदी को सभी आर्थिक बदलावों का कारण मानना सरल निष्कर्ष होगा।
5. बैंक और आम नागरिकों पर भारी दबाव
नोटबंदी के बाद कई सप्ताह तक बैंक और एटीएम के बाहर लंबी कतारें देखी गईं। देश भर से कतारों में खड़े वृद्ध और कमजोर लोगों के मरने की खबरें भी आई|
लोगों को सीमित नकदी निकालने की अनुमति थी। ग्रामीण क्षेत्रों में नए नोटों की उपलब्धता और बैंकिंग सुविधाओं की कमी के कारण कठिनाइयाँ और बढ़ गईं।
आलोचकों का कहना है कि नीति की तैयारी पर्याप्त नहीं थी।
निष्कर्ष
नोटबंदी आज भी भारत की सबसे चर्चित आर्थिक नीतियों में से एक है।
आलोचक इसे आर्थिक दृष्टि से महंगा और अपेक्षित परिणाम न देने वाला निर्णय मानते हैं, जबकि सरकार इसे कर अनुपालन बढ़ाने, डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देने और वित्तीय पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताती है। हालाँकि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इनमें से कुछ बदलाव अन्य नीतियों, तकनीकी प्रगति और बाद के सुधारों के कारण भी हुए, इसलिए इन सभी उपलब्धियों का पूरा श्रेय केवल नोटबंदी को देना उचित नहीं होगा।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि जिस काले धन पर कार्रवाई का दावा करते हुए सरकार ने नोटंबदी का ऐलान किया था लेकिन काला धन कहां गया? उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया ? मोदी सरकार के पास इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं है ?
यही कारण है कि लगभग एक दशक बाद भी नोटबंदी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर होने वाली बहसों का प्रमुख विषय बनी हुई है।
2. जीएसटी (GST) – ऐतिहासिक कर सुधार या छोटे कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती?
1 जुलाई 2017 को भारत में वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax – GST) लागू किया गया। इसे आज़ादी के बाद देश का सबसे बड़ा कर सुधार माना गया। इसका उद्देश्य था कि केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले कई अलग-अलग अप्रत्यक्ष करों—जैसे वैट (VAT), एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एंट्री टैक्स और ऑक्ट्रॉय—को समाप्त करके पूरे देश में “एक राष्ट्र, एक कर” (One Nation, One Tax) व्यवस्था लागू की जाए।
सरकार का कहना था कि इससे टैक्स प्रणाली सरल होगी, टैक्स चोरी कम होगी, कारोबार करना आसान होगा और पूरे देश में एक समान बाजार (Common Market) तैयार होगा।
हालाँकि, जीएसटी लागू होने के बाद विपक्ष, व्यापारिक संगठनों और कई अर्थशास्त्रियों ने इसकी संरचना और क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?
1. जल्दबाज़ी में लागू करने का आरोप
जीएसटी लागू होने के शुरुआती महीनों में पोर्टल की तकनीकी समस्याएँ, नियमों में लगातार बदलाव और बार-बार नई अधिसूचनाएँ जारी होने से व्यापारियों में भ्रम की स्थिति बनी रही।
छोटे और मध्यम व्यवसायों का कहना था कि वे नई प्रणाली के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। कई व्यापारियों को चार्टर्ड अकाउंटेंट की मदद लेनी पड़ी, जिससे उनका खर्च बढ़ गया।
आलोचकों का कहना है कि यदि सरकार कुछ और समय तैयारी में लगाती, तो शुरुआती अव्यवस्था कम हो सकती थी।
2. छोटे व्यापारियों पर अनुपालन (Compliance) का बोझ
जीएसटी लागू होने के बाद व्यापारियों को नियमित रूप से ऑनलाइन रिटर्न भरने, ई-वे बिल बनाने, इनवॉइस मिलान (Invoice Matching) और डिजिटल रिकॉर्ड रखने जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ा।
बड़े उद्योगों के लिए यह अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन छोटे दुकानदारों, किराना व्यापारियों और ग्रामीण व्यवसायों के लिए यह नई व्यवस्था चुनौतीपूर्ण साबित हुई।
कई व्यापारिक संगठनों ने कहा कि कारोबार चलाने से ज्यादा समय कागजी और डिजिटल औपचारिकताओं में लगने लगा।
3. कई टैक्स स्लैब होने पर सवाल
जीएसटी को “एक राष्ट्र, एक कर” कहा गया, लेकिन व्यवहार में इसमें कई कर दरें रखी गईं—0%, 5%, 12%, 18% और 28%।
आलोचकों का कहना है कि जब इतनी अलग-अलग दरें हैं, तो इसे वास्तव में “एक कर” कहना पूरी तरह सही नहीं है।
कई बार यह तय करना भी मुश्किल हो जाता था कि किसी उत्पाद पर कौन-सी दर लागू होगी। कुछ वस्तुओं पर टैक्स दरों को लेकर विवाद भी सामने आए।
4. छोटे उद्योगों और एमएसएमई पर असर
भारत की अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) रोजगार का बड़ा स्रोत हैं।
कई उद्योग संगठनों ने दावा किया कि जीएसटी के शुरुआती वर्षों में छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) प्रभावित हुई क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit) मिलने में देरी होती थी।
नकदी प्रवाह (Cash Flow) की समस्या के कारण कुछ छोटे उद्योगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
5. राज्यों की आय और संघीय ढांचे पर बहस
जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की कर प्रणाली में बड़ा बदलाव आया।
कई राज्यों ने आरोप लगाया कि जीएसटी मुआवजा (GST Compensation) समय पर नहीं मिला, जिससे उनके वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ा।
विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान यह मुद्दा काफी विवादित रहा।
6. बार-बार नियम बदलने की आलोचना
जीएसटी लागू होने के बाद शुरुआती वर्षों में कर दरों, रिटर्न फॉर्म और प्रक्रियाओं में कई बार बदलाव किए गए।
आलोचकों का कहना है कि लगातार बदलते नियमों के कारण व्यापारियों और कर सलाहकारों के लिए व्यवस्था को समझना कठिन हो गया।
निष्कर्ष
जीएसटी भारत के सबसे महत्वाकांक्षी आर्थिक सुधारों में से एक है।
आलोचकों का कहना है कि इसकी अवधारणा अच्छी थी, लेकिन इसे लागू करने का तरीका और शुरुआती तैयारी पर्याप्त नहीं थी, जिससे छोटे व्यापारियों और उद्योगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसी कारण जीएसटी आज भी मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों और सबसे अधिक विवादित नीतियों—दोनों में गिना जाता है।
3. बेरोज़गारी और रोजगार का संकट – क्या वादों के अनुरूप नौकरियाँ बन पाईं?
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रोजगार सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में से एक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तेज़ आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और उद्यमिता को बढ़ावा देकर युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने की बात कही थी। “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी कई योजनाओं का उद्देश्य भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार बढ़ाना था।
लेकिन पिछले एक दशक में रोजगार का मुद्दा लगातार राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बना रहा। विपक्ष, कई अर्थशास्त्रियों, श्रम विशेषज्ञों और छात्र संगठनों का आरोप है कि सरकार रोजगार सृजन के अपने वादों पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। वहीं सरकार का कहना है कि रोजगार को केवल सरकारी नौकरियों से नहीं मापा जा सकता और नई अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार (Self-employment), डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्टार्टअप और बुनियादी ढाँचे के निर्माण से करोड़ों अवसर पैदा हुए हैं।
यही कारण है कि बेरोज़गारी आज भी मोदी सरकार की सबसे चर्चित आलोचनाओं में शामिल रहती है।
आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?
1. युवाओं में बेरोज़गारी लगातार बड़ा मुद्दा बनी रही
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। हर साल लाखों छात्र कॉलेजों, आईटीआई, पॉलिटेक्निक और विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं।
आलोचकों का कहना है कि अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से रोजगार नहीं पैदा कर सकी, जितनी तेज़ी से श्रम बाजार में नए युवा प्रवेश कर रहे थे।
कई स्वतंत्र अध्ययनों और सर्वेक्षणों में युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर सामान्य औसत से अधिक बताई गई। विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में रोजगार की चुनौती को गंभीर माना गया।
2. सरकारी नौकरियों की कमी
सरकारी नौकरी आज भी भारत के करोड़ों युवाओं का सपना है। स्थायी आय, सामाजिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा के कारण हर भर्ती में लाखों उम्मीदवार आवेदन करते हैं।
आलोचकों का आरोप है कि कई मंत्रालयों और सरकारी विभागों में वर्षों तक लाखों पद खाली रहे।
इसके अलावा, कई भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, परिणामों में विलंब और न्यायालयों में लंबित मामलों के कारण उम्मीदवारों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
कई राज्यों में भी भर्ती घोटालों और परीक्षा रद्द होने की घटनाओं ने युवाओं में असंतोष बढ़ाया।
3. “मेक इन इंडिया” से अपेक्षित रोजगार नहीं मिलने की आलोचना
2014 में शुरू किए गए “मेक इन इंडिया” अभियान का उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण (Manufacturing) केंद्र बनाना था।
उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में विदेशी कंपनियाँ भारत में निवेश करेंगी और लाखों नई नौकरियाँ पैदा होंगी।
आलोचकों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में निवेश बढ़ा, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार उम्मीद के अनुरूप नहीं हुआ और रोजगार सृजन भी लक्ष्य के स्तर तक नहीं पहुँच सका।
4. रोजगार की गुणवत्ता पर सवाल
आलोचकों का कहना है कि केवल रोजगार की संख्या नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।
उनका तर्क है कि कई नए रोजगार अस्थायी (Temporary), अनुबंध आधारित (Contractual) या कम आय वाले हैं।
गिग इकोनॉमी (जैसे ऑनलाइन डिलीवरी, कैब सेवाएँ और फ्रीलांस कार्य) ने अवसर तो दिए हैं, लेकिन इनमें सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और स्थायी आय जैसी सुविधाएँ सीमित हैं।
5. कोविड-19 का रोजगार पर प्रभाव
2020 में कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण लाखों लोगों की नौकरियाँ प्रभावित हुईं।
निर्माण, पर्यटन, होटल, छोटे उद्योग, परिवहन और खुदरा व्यापार जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
आलोचकों का कहना है कि महामारी से पहले भी रोजगार की स्थिति मजबूत नहीं थी और लॉकडाउन ने समस्या को और गहरा कर दिया।
6. महिलाओं की श्रम भागीदारी
कई विशेषज्ञों ने महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी (Female Labour Force Participation) को लेकर भी चिंता जताई।
आलोचकों का कहना है कि भारत में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएँ रोजगार से बाहर हैं।
हालाँकि हाल के वर्षों में कुछ आधिकारिक सर्वेक्षणों में महिला श्रम भागीदारी में सुधार के संकेत भी मिले हैं, लेकिन इस विषय पर अलग-अलग आँकड़ों और उनकी व्याख्या को लेकर बहस जारी है।
7. प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर असंतोष
हाल के वर्षों में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और परिणामों के लंबे इंतजार ने युवाओं के बीच नाराज़गी बढ़ाई।
विपक्ष का आरोप है कि लाखों उम्मीदवार वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन समय पर नियुक्तियाँ नहीं हो पातीं।
अर्थशास्त्रियों की राय
रोजगार को लेकर विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है।
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में रोजगार सृजन की गति अभी भी आबादी की जरूरतों से कम है और विनिर्माण क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, सेवा क्षेत्र और बुनियादी ढाँचे में निवेश के कारण रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन पारंपरिक आँकड़ों से इनका पूरा आकलन करना कठिन है।
निष्कर्ष
रोजगार का मुद्दा शायद मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल का सबसे संवेदनशील और सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला विषय रहा है।
आलोचकों का कहना है कि सरकार तेज़ आर्थिक विकास के बावजूद पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध नहीं करा सकी। हालांकि भारत जैसे विशाल और युवा देश में रोजगार की चुनौती किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। फिर भी, यह प्रश्न आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है कि क्या रोजगार सृजन देश की बढ़ती युवा आबादी की अपेक्षाओं के अनुरूप हो पाया है।
4. कृषि कानून और किसान आंदोलन – मोदी सरकार को तीनों कानून वापस क्यों लेने पड़े?
साल 2020 में केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में बड़े सुधारों के उद्देश्य से तीन नए कृषि कानून लागू किए। सरकार का कहना था कि इन कानूनों से किसानों को अपनी फसल बेचने की अधिक स्वतंत्रता मिलेगी, निजी निवेश बढ़ेगा, आधुनिक कृषि व्यवस्था विकसित होगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।
लेकिन इन कानूनों का देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने तीखा विरोध किया। देखते ही देखते यह आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे और सबसे बड़े किसान आंदोलनों में बदल गया।
करीब एक वर्ष तक चले आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर धरने, कई दौर की बातचीत और देशव्यापी राजनीतिक बहस के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
आलोचकों का कहना है कि यह सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और नीतिगत विफलताओं में से एक थी। वहीं सरकार का कहना है कि कानून किसानों के हित में थे, लेकिन जब बड़ी संख्या में किसान उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए, आखिरकार जनता के नाराजगी और असंतोष को देखते हुए उन्हें वापस ले लिया गया।
तीनों कृषि कानून क्या थे?
1. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020
इस कानून का उद्देश्य किसानों को APMC मंडियों के बाहर भी अपनी फसल बेचने की अनुमति देना था।
सरकार का दावा था कि इससे किसानों को अधिक खरीदार मिलेंगे और बेहतर कीमत प्राप्त होगी।
2. किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020
यह कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) से संबंधित था।
सरकार का कहना था कि इससे किसान पहले से तय कीमत पर कंपनियों के साथ समझौता कर सकेंगे, जिससे उनकी आय अधिक स्थिर होगी।
3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020
इस कानून के तहत अनाज, दाल, आलू, प्याज जैसी कई वस्तुओं पर सरकारी नियंत्रण में ढील दी गई।
सरकार का तर्क था कि इससे निजी निवेश, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं का विकास होगा।
आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?
1. किसानों से पर्याप्त चर्चा नहीं हुई
किसान संगठनों और विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इतने बड़े कृषि सुधार लागू करने से पहले किसानों के संगठनों, राज्य सरकारों और कृषि विशेषज्ञों के साथ पर्याप्त संवाद नहीं किया।
उनका कहना था कि यदि पहले व्यापक चर्चा होती, तो इतना बड़ा आंदोलन शायद नहीं होता।
2. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर भरोसे की कमी
हालाँकि तीनों कानूनों में MSP समाप्त करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, लेकिन कई किसानों को आशंका थी कि धीरे-धीरे सरकारी खरीद कम हो जाएगी और मंडी व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी।
आलोचकों का कहना था कि यदि भविष्य में सरकारी खरीद कम हुई तो किसानों की सौदेबाजी की शक्ति घट सकती है।
सरकार लगातार कहती रही कि MSP व्यवस्था जारी रहेगी और सरकारी खरीद बंद नहीं होगी।
हालाँकि विरोध कर रहे किसान MSP को कानूनी गारंटी देने की मांग करते रहे। लेकिन सरकार ने गारंटी देना स्वीकार नहीं किया |
3. बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव की आशंका
कई किसान संगठनों का आरोप था कि नए कानूनों से बड़ी कृषि कंपनियों और कॉर्पोरेट घरानों को अधिक लाभ मिलेगा।
उनका तर्क था कि छोटे किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और बड़ी कंपनियों के सामने उनकी सौदेबाजी की क्षमता सीमित हो सकती है।
4. दिल्ली सीमाओं पर लंबा आंदोलन
पंजाब और हरियाणा के हजारों किसान दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करना चाहते थे लेकिन केंद्र सरकार के आदेश पर पुलिस ने उन्हें दिल्ली में घुसने नहीं दिया|
नवंबर 2020 से हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं—सिंघू, टिकरी और गाज़ीपुर—पर बैठ गए।
यह आंदोलन लगभग एक वर्ष तक चला और इस दौरान कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।
आलोचकों का कहना है कि यदि सरकार शुरुआत में संवाद पर अधिक ध्यान देती, तो टकराव इतना लंबा नहीं चलता।
5. आंदोलन के दौरान मानवीय और सामाजिक मुद्दे
लंबे आंदोलन के दौरान कई किसानों की मृत्यु की खबरें सामने आईं। विभिन्न किसान संगठनों ने मौसम, दुर्घटनाओं, बीमारी और अन्य कारणों से करीब 700 किसानों की मौत का दावा किया।
आलोचकों ने कहा कि आंदोलन का लंबा खिंचना सामाजिक और मानवीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय था।
6. लोकतांत्रिक विरोध और पुलिस कार्रवाई पर सवाल
आंदोलन के दौरान बैरिकेडिंग, इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी प्रतिबंध, पुलिस कार्रवाई और 26 जनवरी 2021 की ट्रैक्टर रैली के बाद हुई हिंसा को लेकर भी व्यापक बहस हुई।
आलोचकों का आरोप था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों के साथ कुछ मामलों में अत्यधिक सख्ती की गई। उन पर लाठी चार्ज किया गया|
7. कानून वापस लेना सरकार की राजनीतिक हार माना गया
19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
आलोचकों ने इसे सरकार की एक बड़ी राजनीतिक विफलता बताया।
उनका कहना था कि यदि कानून वास्तव में इतने लाभकारी थे, तो सरकार उन्हें लागू कराने में जनता का विश्वास क्यों नहीं जीत सकी।
निष्कर्ष
कृषि कानून और किसान आंदोलन मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक रहे।
आलोचकों का कहना है कि सरकार किसानों का विश्वास जीतने में असफल रही और संवाद की कमी के कारण एक बड़ा टकराव पैदा हुआ।कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि भारतीय कृषि क्षेत्र में सुधार आवश्यक थे, लेकिन इतने बड़े बदलाव के लिए अधिक व्यापक परामर्श, चरणबद्ध क्रियान्वयन और किसानों के विश्वास का निर्माण जरूरी था।
यह प्रकरण केवल तीन कानूनों का विवाद नहीं था, बल्कि इसने यह भी दिखाया कि भारत जैसे लोकतंत्र में बड़े आर्थिक सुधारों के लिए नीति के साथ-साथ संवाद, विश्वास और सहमति भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

