स्वतंत्रता दिवस 2025 के अवसर पर दिल को झकझोर देने वाला देशभक्ति भाषण

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है दिनेश नीर और मेरी तरफ से आप सभी दोस्तों को स्वतंत्रता दिवस 2025 की हार्दिक बधाई। happy independence day 2025 on every Indian’s. दोस्तों आज इस स्वतंत्रता दिवस 2025 के मुबारक मौके पर आप सभी देशवासियों से कुछ कहना चाहता हूं। अगर आपको अपने भारत देश से प्यार है। अगर आप सच्चे देशभक्त हैं तो इस आर्टिकल को पूरा जरूर पढ़ना।

स्वतंत्रता दिवस 2025 के अवसर पर देशभक्ति भाषण

दोस्तों, पहले मैं सोचा करता था कि काश मैं भी एक फौजी होता। काश मैं भी अपने भारत मां के चरणों में अपने प्राणों की भेंट चढ़ा पाता। लेकिन शायद मैं इतना खुशनसीब नहीं था। इसलिए मेरी यह ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। अब बस यहीं सोच कर दिल को तसल्ली मिलती है कि कोई जरुरी नहीं है कि सरहद पर रह कर ही देश की सेवा की जाएं। देश के अंदर अपने देशवासियों की सेवा करके भी देशभक्ति का फर्ज अदा किया जा सकता है। वैसे भी हमारी असली लड़ाई सरहद पर बैठ दुश्मनों से नहीं बल्कि देश के अंदर छुपे देशद्रोहियों और गद्दारों से है। जो अपने ही देश को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। जो अपने फायदे के लिए हमारे देश के भोले-भाले लोगों को मजहब और जातीयता के नाम पर भड़का कर दंगे फसाद करवा रहे हैं।

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हमारे देश के असली दुश्मन तो वे है। हमारी असली लड़ाई तो उनसे है जो मंदिर मस्जिद के नाम पर हमारे देश की एकता और अखंडता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जो खुद को देशभक्त बता कर देश के युवाओं में नफ़रत और हिंसा का बीज बो रहे हैं। शायद इन्हें देशभक्ति का मतलब पता भी या नहीं। अरे सच्चा देशभक्त तो उसे कहते हैं जो निःस्वार्थ भाव से अपने देश के लोगों की सेवा करें। जो देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें। जो अपने देशवासियों के बीच मोहब्बत, अमन और भाईचारे को बढ़ावा दे। लेकिन पता नहीं ये कैसे देशभक्त हैं ये। जो अपने ही देश को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। जो भारत मां के उस दर्द को महसूस नहीं कर पा रहे हैं। जिसे मैं महसूस कर रहा हूं। हां, मैं भारत माता के उस दर्द को महसूस करता हूं। जिसे शायद ही कोई समझ पाता होगा। उस दर्द को एक सच्चा देशभक्त ही महसूस कर सकता है। जिसके दिल अपने देश के लिए सच्चा प्रेम हो।

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दोस्तों, मैं भारत के दिल दिल्ली में रहता हूं और भारत मां के दिल के बेहद करीब हूं। इसलिए मैं भारत मां के उस दर्द को महसूस कर सकता हूं जो अपने बेटों की खुदगर्जी और कर्त्तव्य विमुखता को देख कर होता हैं। वह मां जो अपने 140 करोड़ बच्चों की दुर्दशा को देखकर रोती है। मैं उस मां के दर्द को महसूस कर सकता हूं जो कभी निर्भया तो कभी आसिफा को याद करके आंसु बहाती है। कभी कभी सोचता हूं कि मैं भी उग्रवादी बन कर सारे पापियों और देशद्रोहियों का नाश कर दूं। परंतु मैं जानता हूं कि इससे ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा क्योंकि बिमारी शाखाओं में नहीं, जड़ों में हैं। वैसे भी कीचड़ से कीचड़ को साफ नहीं किया जा सकता और हमारे देश का सांविधान भी इसकी इजाजत नहीं देता। इसलिए कभी कभी मन करता है कि इतना रोऊं इतना रोऊं की मेरे आंसुओं से पूरा देश भीग जाएं। लेकिन मैं जानता हूं कि रोने से भी कुछ नहीं होगा। इसलिए बार बार अपने उन देशवासियों को समझाने का प्रयत्न कर रहा हूं। जिन्हें केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही देश की याद आती है।

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देखिए मैं बार बार पीछे की ओर देखकर गौरवान्वित महसूस नहीं करना चाहता। कि हमने अंग्रेजों को भगा दिया, हमने परमाणु बम बना लिया, हम चांद पर पहुंच गए। हमने ये कर दिया, हमने वो कर दिया। जैसे राजनेता लोग करते हैं। मैं एक आम आदमी हूं। और मैं सबसे आम समस्याओं को ही प्राथमिकता देता हूं। गरीबी, महंगाई, साफ सफाई, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, कानून व्यवस्था। इन्हीं सब चीजों से ही तो पता चलता है कि कौन देश कितना प्रगति कर रहा है। कितना ख़ुशहाल है। और शायद आपको यह बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि हम इन सब चीजों में कितने फिसड्डी है। जब मैं अतीत की ओर देखता हूं तो मुझे गौरव नहीं होता बल्कि दुःख होता है क्योंकि हम अभी भी वह भारत नहीं बना पाए है। जिसका सपना गांधी, अंबेडकर और विवेकानंद ने देखा था। यह वह भारत नहीं है जिसमें लिए हमारे लाखों भाईयों ने अपनी कुर्बानी दी थी। अब यह वह भारत नहीं रहा जिसे अनेकता में एकता का देश कहां जाता था। इसके तो अब साउथ इंडिया, नार्थ इंडिया और ईस्ट इंडिया जैसे कई टुकड़े हो चुके हैं। अब वह दिन नहीं रहा जब हिन्दू और मुस्लिम साथ मिलकर होली और ईद मनाते थे। यहां तो अब रात दिन धर्म और जाति के नाम पर लड़ाई झगडे हो रहें हैं। और यह काम वहीं बुद्धिजीवी लोग करवा रहे हैं। जिनके हाथों में हमारे देश का उत्तरदायित्व है।

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हमारे स्वामी विवेकानंद कहते थे कि किसी देश का भविष्य वहां के युवाओं पर टिका होता है। लेकिन मुझे यह देखकर बहुत दुःख होता है कि हमारे देश के युवाओं का भविष्य फेसबुक, इंस्टग्राम और लड़कियों की अदाओं पर टिका हुआ है। हमारे देश के युवाओं का भविष्य ड्रीम इलेवन और फ्री फायर जैसे आनलाइन गेम्स पर टिका हुआ है। जिसमें हार और जीत कुछ भी निश्चित नहीं है। अब जब उनको खुद का भविष्य ही नहीं पता है तो वे देश का भविष्य क्या देखेंगे। जिस देश के युवा saiyaara जैसी मूवी देख कर सिनेमाघरों में रो रहे हो। उस देश का विकास क्या खाक होगा। पता है, चीन और जापान में पांच साल के बच्चे भी कोडिंग और मार्शल आर्ट सीख रहे हैं। और हमारे देश के बच्चे बचपन का प्यार और कच्चा बादाम पर डांस कर रहे हैं। रूस और अमेरिका के लड़के क्वांटम फिजिक्स पर रिसर्च कर रहे हैं और यहां हमारे देश के युवा पंद्रह हजार की नौकरी के लिए ट्रेन और बसें जला रहे हैं। बेवकूफ, अपने ही देश की संपत्ति को बर्बाद कर रहे हैं। क्या चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और खुदीराम बोस ने यहीं दिन देखने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। आज अगर ये लोग भी आसमान से देश की हालत देख कर आंसू बहा रहे होंगे। मैं नहीं जानता कि यह सब सुनकर आपको कुछ एहसास हो रहा है या नहीं लेकिन फिर भी मैं आप से पूछ रहा हूं। क्या ऐसे हमारा देश खुशहाल बन सकेगा। ‌अपनी आत्मा में पूछ कर ईमानदारी से जवाब दिजिए फिर तिरंगा झंडा फहराइयेंगा। धन्यवाद 🙏

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