आज के AI के दौर में लगभग हर चीज की नकल होने लगी है। हो सकता है कि कभी सोशल मीडिया पर किसी नेता, अभिनेता या प्रसिद्ध व्यक्ति का ऐसा वीडियो देखने को मिले, जिसमें वह कुछ ऐसा कह रहा हो जिस पर विश्वास करना मुश्किल हो? हो सकता है, कभी किसी परिचित की आवाज़ में फोन कॉल सुनने को मिले, जिसमें वह अचानक पैसे माँगने लगे? ऐसी स्थिति में सावधान रहना जरूरी है, क्योंकि हो सकता है कि आपने जो देखा या सुना है, वह असली न हो।
आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज़ और हाव-भाव की नकल करके ऐसे वीडियो और ऑडियो बनाए जा सकते हैं, जो देखने और सुनने में वास्तविक लगते हैं। इन्हें डीपफेक (Deepfake) कहा जाता है। जब ऐसी नकली सामग्री का इस्तेमाल झूठी खबर फैलाने, लोगों को गुमराह करने, किसी की छवि खराब करने या धोखाधड़ी करने के लिए किया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि डीपफेक क्या है, डीपफेक न्यूज़ कैसे फैलती है, असली और नकली वीडियो की जाँच कैसे करें, AI से बनी नकली आवाज़ से होने वाली ठगी से कैसे बचें और भारत में ऐसी सामग्री की शिकायत कहाँ करें।
डीपफेक क्या है?
डीपफेक एक ऐसी तस्वीर, वीडियो या ऑडियो सामग्री है जिसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से किसी व्यक्ति की पहचान, चेहरा, आवाज़ या गतिविधियों को कृत्रिम रूप से बनाने या बदलने के लिए तैयार किया जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने वास्तव में कोई बयान नहीं दिया, लेकिन AI की मदद से उसका ऐसा वीडियो तैयार कर दिया गया जिसमें वह वही बयान देता हुआ दिखाई देता है। यदि वीडियो को वास्तविक बताकर शेयर किया जाता है, तो लोग उस व्यक्ति के बारे में गलत धारणा बना सकते हैं।
इसी तरह, किसी की आवाज़ के नमूने से मिलती-जुलती कृत्रिम आवाज़ तैयार करके ऐसा ऑडियो बनाया जा सकता है, जिसमें वह व्यक्ति ऐसी बातें कहता हुआ सुनाई दे जो उसने कभी कही ही नहीं।
वैसे डीपफेक तकनीक का हर इस्तेमाल गलत नहीं होता। इसका उपयोग फिल्मों, मनोरंजन, शिक्षा, डबिंग और रचनात्मक परियोजनाओं में भी किया जा सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इसका इस्तेमाल धोखा देने, बिना सहमति किसी की पहचान का दुरुपयोग करने या जानबूझकर गलत जानकारी फैलाने के लिए किया जाता है।
भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In ने 27 नवंबर 2024 को जारी अपनी एडवाइजरी में डीपफेक से जुड़े गलत सूचना प्रसार, धोखाधड़ी और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचने जैसे जोखिमों के बारे में चेतावनी दी थी।
डीपफेक और सामान्य एडिटिंग में क्या अंतर है?
सामान्य वीडियो एडिटिंग में वीडियो को काटना, जोड़ना, रंग बदलना, बैकग्राउंड म्यूजिक लगाना या कैप्शन जोड़ना शामिल हो सकता है। इससे वीडियो का रूप बदल सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की पहचान या उसके बोले गए शब्दों को कृत्रिम रूप से बनाना संभव नहीं है।
परंतु डीपफेक में AI का उपयोग करके चेहरे की अदला-बदली, आवाज़ की नकल, होंठों की गतिविधियों में बदलाव या नई दृश्य सामग्री भी तैयार की जा सकती है।
हालाँकि, हर भ्रामक वीडियो डीपफेक नहीं होता। कभी-कभी असली वीडियो को गलत कैप्शन के साथ शेयर किया जाता है। कभी पुराने वीडियो को नई घटना बताकर फैलाया जाता है। कभी वीडियो का एक हिस्सा काटकर दिखाया जाता है, जिससे उसका अर्थ बदल जाता है।
इसलिए किसी वायरल वीडियो की जाँच करते समय हमें यह भी देखना चाहिए कि वह AI से बनाया गया है, एडिट किया गया है या वास्तविक होते हुए भी गलत संदर्भ में इस्तेमाल किया जा रहा है।
डीपफेक न्यूज़ इतनी खतरनाक क्यों है?
पहले किसी व्यक्ति की आवाज़ या चेहरा नकली बनाना अपेक्षाकृत कठिन और महँगा हो सकता था। अब AI टूल्स के कारण इस तरह की सामग्री तैयार करना कई लोगों के लिए अधिक सुलभ हो गया है। इससे गलत जानकारी फैलाने वालों को नई सुविधाएँ मिलती हैं।
डीपफेक न्यूज़ के खतरनाक होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।
1. लोग आँखों और कानों पर भरोसा कर लेते हैं
हम आमतौर पर किसी व्यक्ति को अपनी आँखों से कुछ कहते हुए देखते हैं, तो मान लेते हैं कि उसने सच में वही कहा होगा। लेकिन डीपफेक इस भरोसे का फायदा उठा सकता है।
कोई नकली वीडियो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को ऐसा बयान देते हुए दिखा सकता है, जिससे विवाद पैदा हो जाए। वीडियो असली जैसा लगने के कारण लोग उसकी सत्यता जाँचे बिना उसे शेयर कर सकते हैं।
2. झूठी खबर बहुत तेजी से फैल सकती है
सोशल मीडिया पर सनसनीखेज और भावनात्मक सामग्री तेजी से लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती है। जब किसी वीडियो में गुस्सा, डर, धर्म, राजनीति या किसी बड़े विवाद से जुड़ा संदेश होता है, तो लोग उसे दूसरों तक पहुँचाने के लिए जल्दी कर सकते हैं।
ऐसे में एक ही नकली वीडियो हजारों लोगों तक पहुँच सकता है, जबकि उसकी सच्चाई की जाँच बहुत कम लोग करते हैं।
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3. किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है
किसी व्यक्ति का नकली वीडियो बनाकर उसे आपत्तिजनक, विवादित या गैरकानूनी गतिविधि करते हुए दिखाया जा सकता है। इससे उसके परिवार, काम, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक छवि पर असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों से संबंधित नकली या बिना सहमति बनाई गई अंतरंग सामग्री गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है। ऐसी सामग्री को डाउनलोड करना, दोबारा शेयर करना या दूसरों को भेजना पीड़ित की परेशानी बढ़ा सकता है।
4. आर्थिक धोखाधड़ी हो सकती है
डीपफेक का इस्तेमाल केवल फर्जी खबर फैलाने के लिए ही नहीं, बल्कि पैसे ठगने के लिए भी किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के वरिष्ठ अधिकारी, रिश्तेदार या परिचित जैसी आवाज़ बनाकर तत्काल पैसे भेजने के लिए कहा जा सकता है। अगर सामने वाला व्यक्ति पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किए बिना पैसे भेज देता है, तो उसका आर्थिक नुकसान हो सकता है।
डीपफेक न्यूज़ कैसे बनाई और फैलाई जाती है?

डीपफेक न्यूज़ के पीछे कई तरह की तकनीकें और तरीके हो सकते हैं।
1. फेस स्वैप यानी चेहरे की अदला-बदली
इस तकनीक में किसी वीडियो में दिखाई देने वाले व्यक्ति के चेहरे को किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे से बदल दिया जाता है। नतीजा ऐसा वीडियो हो सकता है जिसमें व्यक्ति की पहचान वास्तविक जैसी लगे, लेकिन वीडियो में दिखाई गई गतिविधि या परिस्थिति भ्रामक हो।
2. AI वॉइस क्लोनिंग
वॉइस क्लोनिंग में AI किसी व्यक्ति की आवाज़ की विशेषताओं की नकल करके नई आवाज़ तैयार कर सकता है। इसका गलत इस्तेमाल करके नकली फोन कॉल, ऑडियो संदेश या वीडियो बनाए जा सकते हैं।
इसलिए केवल परिचित आवाज़ सुनकर यह मान लेना सुरक्षित नहीं है कि कॉल करने वाला व्यक्ति वास्तव में वही है।
3. नकली बयान और संदर्भ बदलना
किसी वास्तविक भाषण या इंटरव्यू के साथ छेड़छाड़ करके ऐसा दिखाया जा सकता है कि व्यक्ति ने कुछ और कहा था। कभी वीडियो को छोटे हिस्से में काट दिया जाता है, तो कभी पुरानी क्लिप को वर्तमान घटना बताकर प्रसारित किया जाता है।
यह हर बार डीपफेक नहीं होता, लेकिन इससे फैलने वाली गलत जानकारी का असर उतना ही गंभीर हो सकता है।
4. नकली कैप्शन और भ्रामक दावे
किसी वास्तविक तस्वीर या वीडियो के साथ झूठा दावा जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के लिए, किसी दूसरे देश में हुई घटना के वीडियो को भारत की घटना बताकर शेयर करना या पुराने भाषण को हाल का बयान बताना।
इस तरह की सामग्री की जाँच में वीडियो की तारीख, स्थान और मूल स्रोत की पुष्टि करना बहुत जरूरी है।
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डीपफेक की पहचान कैसे करें? 10 जरूरी संकेत

डीपफेक की पहचान करने का कोई एक आसान तरीका हर परिस्थिति में काम नहीं करता। आधुनिक AI से बनी सामग्री में छोटी-मोटी दृश्य गलतियाँ भी नहीं दिख सकतीं। फिर भी कुछ संकेत आपको सावधान कर सकते हैं।
1. होंठों और आवाज़ का तालमेल देखें
वीडियो में व्यक्ति के होंठों की गति और सुनाई देने वाली आवाज़ में असामान्य अंतर दिखाई दे सकता है। हालाँकि, खराब इंटरनेट कनेक्शन, वीडियो एडिटिंग या रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता के कारण भी ऐसा हो सकता है। इसलिए यह संकेत अकेले निर्णायक प्रमाण नहीं है।
2. चेहरे के हाव-भाव पर ध्यान दें
कभी-कभी चेहरे की अभिव्यक्ति, आँखों की गतिविधि या सिर के हिलने में अस्वाभाविकता दिखाई दे सकती है। लेकिन अब कई नकली वीडियो इन कमियों के बिना भी बनाए जा सकते हैं।
3. रोशनी और परछाइयाँ देखें
चेहरे और शरीर पर पड़ने वाली रोशनी, आसपास की वस्तुओं की परछाइयों और दृश्य के बाकी हिस्से में असंगति हो सकती है। फिर भी वीडियो की कम्प्रेशन या सामान्य एडिटिंग भी ऐसा प्रभाव पैदा कर सकती है।
4. आवाज़ की गुणवत्ता जाँचें
आवाज़ में अचानक बदलाव, अस्वाभाविक उतार-चढ़ाव या बोलने के ढंग में अंतर संदेह पैदा कर सकता है। यदि आप उस व्यक्ति को पहले से जानते हैं, तो उसकी सामान्य बोलने की शैली से तुलना मददगार हो सकती है। लेकिन आवाज़ सुनकर ही असली या नकली होने का अंतिम निर्णय न लें।
5. हाथों और दूसरी वस्तुओं पर ध्यान दें
कुछ AI-निर्मित वीडियो में हाथों, उँगलियों, चश्मे, आभूषणों या दूसरी वस्तुओं की बनावट असामान्य हो सकती है। हालाँकि, यह समस्या हर डीपफेक में नहीं मिलती और तकनीक में सुधार के साथ ऐसे संकेत कम हो सकते हैं।
6. वीडियो का मूल स्रोत खोजें
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वीडियो सबसे पहले कहाँ प्रकाशित हुआ था। क्या वह संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक अकाउंट, किसी विश्वसनीय समाचार संस्थान या मूल कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग में मौजूद है?
यदि वीडियो केवल अनजान अकाउंटों पर मिल रहा है, तो सावधानी बरतें। लेकिन केवल किसी आधिकारिक अकाउंट पर वीडियो न मिलने से वह अपने आप नकली साबित नहीं हो जाता। हो सकता है कि उस अकाउंट पर उस वीडियो का डेटा उपलब्ध ही ना हो।
7. तारीख और संदर्भ की पुष्टि करें
कई बार पुरानी रिकॉर्डिंग को वर्तमान घटना बताकर शेयर किया जाता है। वीडियो में दिखाई देने वाले स्थान, मौसम, कपड़ों, कार्यक्रम या घटना से जुड़े विवरणों की जाँच करें।
वीडियो की तारीख और संदर्भ की पुष्टि करने से ऐसी भ्रामक सामग्री पकड़ी जा सकती है जो तकनीकी रूप से असली हो, लेकिन उसका इस्तेमाल गलत दावा साबित करने के लिए किया जा रहा हो।
8. विश्वसनीय समाचार स्रोतों से तुलना करें
यदि वीडियो में किसी बड़े राजनीतिक बयान, सरकारी घोषणा, दुर्घटना या हिंसक घटना का दावा किया गया है, तो देखें कि विश्वसनीय समाचार संस्थानों ने उस घटना की रिपोर्ट की है या नहीं।
यदि दावा सरकारी योजना या आदेश से जुड़ा है, तो संबंधित सरकारी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या मूल दस्तावेज भी देखें।
9. फैक्ट-चेक वेबसाइट पर खोजें
संभव है कि वायरल वीडियो की जाँच पहले ही किसी तथ्य-जाँच संस्था ने की हो। आप Google Fact Check Explorer और विश्वसनीय फैक्ट-चेक संस्थानों की वेबसाइटों पर संबंधित दावे या वीडियो के बारे में खोज सकते हैं।
भारत सरकार से संबंधित दावों के लिए PIB Fact Check उपयोगी हो सकता है। ध्यान रखें कि PIB Fact Check का दायरा केंद्र सरकार, उसके मंत्रालयों, विभागों और संबंधित सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं से जुड़े दावों तक सीमित है।
10. AI डिटेक्टर पर आँख बंद करके भरोसा न करें
कुछ ऑनलाइन टूल तस्वीरों, वीडियो या ऑडियो में AI-निर्मित सामग्री के संकेत खोजने का प्रयास करते हैं। लेकिन इन टूल्स से गलत परिणाम भी आ सकते हैं।
किसी टूल का परिणाम अपने आप में अंतिम प्रमाण नहीं है। वीडियो की उत्पत्ति, मूल रिकॉर्डिंग, विश्वसनीय स्रोतों और स्वतंत्र तथ्य-जाँच को भी देखना चाहिए।
याद रखें: कोई स्पष्ट गड़बड़ी न दिखना इस बात की गारंटी नहीं है कि वीडियो असली है। इसी तरह, वीडियो में कोई असामान्य दृश्य दिखना अपने आप में डीपफेक होने का निर्णायक सबूत नहीं है।
किसी वायरल वीडियो की सच्चाई जाँचने के 7 व्यावहारिक कदम

अब सवाल है कि यदि आपके WhatsApp, Instagram, Facebook या YouTube पर कोई संदिग्ध वीडियो आता है, तो आपको क्या करना चाहिए?
कदम 1: वीडियो तुरंत शेयर न करें
सबसे पहले वीडियो को रोकें और उसमें किए गए दावे को समझें। यदि वीडियो गुस्सा दिलाता है, डर पैदा करता है या तुरंत दूसरों तक पहुँचाने के लिए उकसाता है, तो कुछ समय लेकर उसकी जाँच करें।
कदम 2: वीडियो से जुड़ा दावा लिखकर खोजें
वीडियो में कही गई मुख्य बात को सरल शब्दों में Google पर खोजें। उदाहरण के लिए, यदि दावा है कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति ने कोई घोषणा की है, तो उस व्यक्ति का नाम और घोषणा से जुड़े मुख्य शब्द खोजें।
यदि दावा वास्तविक है और सार्वजनिक महत्व का है, तो संभव है कि उसके बारे में विश्वसनीय रिपोर्ट या आधिकारिक जानकारी उपलब्ध हो।
कदम 3: वीडियो का स्क्रीनशॉट लेकर Google Lens इस्तेमाल करें
वीडियो के किसी स्पष्ट फ्रेम का स्क्रीनशॉट लें। फिर Google Lens या Google Images में उस तस्वीर को खोजें।
इससे पता चल सकता है कि वही तस्वीर या वीडियो पहले किसी दूसरी घटना, तारीख या स्थान के संदर्भ में प्रकाशित हुआ था या नहीं।
ध्यान दें कि केवल एक स्क्रीनशॉट से वीडियो की पूरी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती। यह शुरुआती जाँच का तरीका है।
कदम 4: वीडियो के पुराने संस्करण खोजें
यदि संभव हो, तो वीडियो में दिखाई देने वाले भाषण, घटना या दृश्य के पुराने संस्करण खोजें। कभी-कभी मूल वीडियो में पूरी बात सुनने पर पता चलता है कि वायरल क्लिप में महत्वपूर्ण हिस्सा हटा दिया गया था।
कदम 5: आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें
यदि वीडियो किसी सरकारी आदेश, योजना, चुनाव, सार्वजनिक घोषणा या किसी संस्था के बयान के बारे में है, तो संबंधित संस्था की आधिकारिक वेबसाइट, प्रेस विज्ञप्ति या सत्यापित अकाउंट देखें।
किसी बड़े दावे की पुष्टि केवल अनजान सोशल मीडिया अकाउंट से न करें।
कदम 6: फैक्ट-चेक संसाधनों का इस्तेमाल करें
इन संसाधनों से शुरुआत की जा सकती है:
- Google Fact Check Explorer: https://toolbox.google.com/factcheck/explorer
- Google Lens: https://lens.google.com/
- PIB Fact Check: https://factcheck.pib.gov.in/
- CERT-In: https://www.cert-in.org.in/
इनमें से प्रत्येक संसाधन का उद्देश्य अलग है। Google Lens दृश्य सामग्री के पुराने संदर्भ खोजने में मदद कर सकता है, PIB Fact Check केंद्र सरकार से संबंधित दावों की जाँच करता है और CERT-In साइबर सुरक्षा से जुड़ी सलाह उपलब्ध कराता है।
कदम 7: पुष्टि न हो तो वीडियो आगे न भेजें
यदि वीडियो की सच्चाई स्पष्ट नहीं होती, तो उसे असली या नकली घोषित करने की जल्दी न करें। उसे शेयर करने से बचें और अपनी पोस्ट में यह दावा न करें कि आपने उसकी पुष्टि कर ली है, जब तक आपके पास पर्याप्त प्रमाण न हों।
Google भी अपनी सूचना-गुणवत्ता संबंधी जानकारी में रिवर्स इमेज सर्च और फैक्ट-चेक संसाधनों का उपयोग करके तस्वीरों और दावों का संदर्भ समझने की सलाह देता है।
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डीपफेक से होने वाली ऑनलाइन ठगी से कैसे बचें

डीपफेक का एक गंभीर इस्तेमाल किसी परिचित या भरोसेमंद व्यक्ति की नकल करके पैसे ठगना है।
अमेरिकी FBI ने 2025 में चेतावनी दी थी कि अपराधी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीरों में बदलाव करके अपहरण से जुड़ी झूठी परिस्थितियों का प्रमाण दिखाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी ठगी में पीड़ितों को किसी परिचित के नुकसान या खतरे का डर दिखाकर तुरंत पैसे माँगे जा सकते हैं।
यह उदाहरण बताता है कि नकली तस्वीर या वीडियो का इस्तेमाल केवल ऑनलाइन अफवाह फैलाने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक लोगों से पैसे वसूलने के लिए भी किया जा सकता है।
उदाहरण: परिवार के सदस्य की नकली आवाज़
मान लीजिए, आपको फोन आता है। दूसरी तरफ से आपके बेटे, भाई या किसी करीबी जैसी आवाज़ सुनाई देती है। वह कहता है कि वह मुसीबत में है और उसे तुरंत पैसे चाहिए।
ऐसी स्थिति में घबराकर पैसे भेजने के बजाय ये कदम उठाएँ:
- कॉल काटकर उस व्यक्ति के पहले से सेव किए गए नंबर पर खुद फोन करें।
- यदि वह फोन नहीं उठा रहा है, तो परिवार के दूसरे सदस्य से स्वतंत्र रूप से संपर्क करें।
- परिवार में पहले से तय किसी गोपनीय शब्द या सवाल से पहचान की पुष्टि करें।
- किसी अनजान खाते में जल्दबाजी में पैसे न भेजें।
- यदि आर्थिक धोखाधड़ी हो गई है, तो तुरंत बैंक और संबंधित साइबर अपराध सहायता तंत्र से संपर्क करें।
अपराधी डर और जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। इसलिए पहचान की पुष्टि करना सबसे जरूरी कदम है।
डीपफेक से राजनीति और समाज पर क्या असर पड़ सकता है?
राजनीति और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में देखे और शेयर किए जाते हैं। यदि किसी नेता का नकली वीडियो वास्तविक बताकर प्रसारित किया जाता है, तो इससे जनता की राय प्रभावित हो सकती है, विवाद पैदा हो सकते हैं और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
इसी तरह, किसी धर्म, जाति या समुदाय के बारे में नकली वीडियो फैलाकर तनाव पैदा करने की कोशिश की जा सकती है।
यहाँ एक जरूरी अंतर समझना चाहिए: किसी वीडियो पर सवाल उठाना उचित है, लेकिन बिना प्रमाण किसी व्यक्ति, समुदाय, राजनीतिक दल या देश पर आरोप लगाना सही नहीं है। तथ्य-जाँच का उद्देश्य सच्चाई का पता लगाना होना चाहिए, न कि पहले से बनी धारणा को सही साबित करना।
किसी भी राजनीतिक या सामाजिक दावे की जाँच करते समय वीडियो के साथ-साथ उसका मूल स्रोत, तारीख, पूरा संदर्भ और स्वतंत्र प्रमाण देखना चाहिए।
केस स्टडी: AI से बदले गए वीडियो और नकली पहचान के मामले
मामला 1: सरकारी अधिकारी के नाम से नकली वीडियो
भारत सरकार की तथ्य-जाँच इकाई ने एक ऐसे डिजिटल रूप से बदले गए वीडियो के बारे में चेतावनी दी थी, जिसमें रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह को भारत की प्रणालियों को बाधित किए जाने के बारे में दावा करते हुए दिखाया गया था। सरकारी फैक्ट-चेक ने उस वीडियो को AI से बनाया गया डीपफेक बताया।
इस मामले से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है: किसी वीडियो में सरकारी अधिकारी या किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति को बोलते हुए देखकर ही उसके बयान को सच नहीं मान लेना चाहिए। संबंधित विभाग की आधिकारिक जानकारी और विश्वसनीय तथ्य-जाँच से पुष्टि करना आवश्यक है।
मामला 2: परिचित व्यक्ति की नकली तस्वीर या वीडियो से डराकर पैसे माँगना
FBI ने 2025 में चेतावनी दी कि अपराधी सोशल मीडिया पर उपलब्ध तस्वीरों में बदलाव करके किसी परिचित व्यक्ति के संकट में होने का झूठा प्रमाण पेश कर सकते हैं। इसके बाद वे तत्काल पैसे माँग सकते हैं।
इस तरह की ठगी में असली चुनौती केवल नकली तस्वीर पहचानना नहीं, बल्कि डर के कारण जल्दबाजी में फैसला लेने से बचना भी है।
सीख: यदि कोई व्यक्ति किसी आपात स्थिति का हवाला देकर पैसे माँगता है, तो किसी स्वतंत्र और पहले से सत्यापित माध्यम से उसकी पहचान और परिस्थिति की पुष्टि करें।
स्रोत: FBI — बदली गई तस्वीरों और नकली प्रमाण से जुड़ी ठगी की चेतावनी
ये उदाहरण बताते हैं कि डीपफेक और डिजिटल हेरफेर की जाँच केवल तकनीकी विशेषज्ञों का काम नहीं है। आम नागरिक भी सही सवाल पूछकर और स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि करके नुकसान कम करने में मदद कर सकते हैं।
भारत में डीपफेक या फर्जी सामग्री की शिकायत कैसे करें?
यदि कोई आपकी तस्वीर या वीडियो का दुरुपयोग कर रहा है, आपकी पहचान बनाकर धोखाधड़ी कर रहा है या आपके खिलाफ आपत्तिजनक नकली सामग्री फैला रहा है, तो कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं।
1. सबूत सुरक्षित रखें
संदिग्ध पोस्ट, प्रोफाइल, URL, फोन नंबर, चैट और तारीख-समय का रिकॉर्ड रखें। यदि सुरक्षित और कानूनी रूप से संभव हो, तो स्क्रीनशॉट और मूल संदेश सुरक्षित करें।
आपत्तिजनक अंतरंग सामग्री, खासकर बच्चों से संबंधित सामग्री, को डाउनलोड या दोबारा शेयर न करें। उसकी रिपोर्ट करने के लिए संबंधित प्लेटफॉर्म और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के निर्देशों का पालन करें।
2. संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट करें
जिस प्लेटफॉर्म पर सामग्री प्रकाशित हुई है, वहाँ उपलब्ध रिपोर्ट विकल्प का इस्तेमाल करें। यदि मामला आपकी पहचान के दुरुपयोग, निजी तस्वीरों, धमकी या धोखाधड़ी का है, तो रिपोर्ट में सही श्रेणी चुनें और आवश्यक जानकारी दें।
3. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का इस्तेमाल करें
भारत में साइबर अपराध की शिकायत के लिए आधिकारिक पोर्टल उपलब्ध है:
वेबसाइट: https://cybercrime.gov.in/
वित्तीय साइबर धोखाधड़ी होने पर 1930 हेल्पलाइन पर जल्द संपर्क करना उपयोगी हो सकता है। जहाँ मामला गंभीर हो, वहाँ स्थानीय पुलिस से भी संपर्क करें।
4. सरकारी दावों के लिए PIB Fact Check देखें
यदि मामला केंद्र सरकार, उसके मंत्रालयों या संबंधित सरकारी घोषणाओं के बारे में है, तो PIB Fact Check से जाँच की जा सकती है।
- वेबसाइट: https://factcheck.pib.gov.in/
- WhatsApp हेल्पलाइन: +91 8799711259
- ईमेल: factcheck@pib.gov.in
ध्यान रखें कि PIB Fact Check सभी निजी, स्थानीय या व्यक्तिगत विवादों की जाँच करने वाली सामान्य सेवा नहीं है।
5. जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लें
डीपफेक के मामले में लागू कानून इस बात पर निर्भर कर सकते हैं कि सामग्री का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया, उससे किस तरह का नुकसान हुआ और उसमें कौन-से अपराध शामिल हैं। पहचान की चोरी, धोखाधड़ी, निजता के उल्लंघन या आपत्तिजनक सामग्री के मामलों में संबंधित कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं।
किसी विशेष मामले में कानूनी कार्रवाई की जानकारी के लिए योग्य वकील या संबंधित पुलिस अधिकारी से सलाह लें।
भारत में डीपफेक से जुड़े कानून क्या कहते हैं?
डीपफेक के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में भारत के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 सहित विभिन्न कानूनी प्रावधान प्रासंगिक हो सकते हैं।
कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह घटना की प्रकृति और उपलब्ध सबूतों पर निर्भर करता है। केवल AI से बनाई गई सामग्री होना अपने आप में हर परिस्थिति में एक ही कानूनी परिणाम नहीं पैदा करता। सामग्री का उद्देश्य, सहमति, धोखाधड़ी, निजता और उससे जुड़े अन्य तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं।
नियमों और सरकारी दिशानिर्देशों में बदलाव हो सकते हैं, इसलिए किसी खास मामले में वर्तमान नियमों की आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करना चाहिए।
स्रोत: भारत सरकार का प्रेस सूचना ब्यूरो — डीपफेक और AI से बनी सामग्री पर सरकारी जानकारी
यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं।
डीपफेक से बचने के लिए 10 जरूरी सावधानियाँ

- हर वायरल वीडियो पर तुरंत विश्वास न करें। पहले उसकी सच्चाई जाँचें।
- बिना पुष्टि वीडियो शेयर न करें। आप अनजाने में गलत सूचना फैलाने का हिस्सा बन सकते हैं।
- पैसे भेजने से पहले पहचान की पुष्टि करें। परिचित आवाज़ भी धोखा दे सकती है।
- परिवार के साथ गोपनीय पहचान शब्द तय करें। आपात स्थिति में इससे मदद मिल सकती है।
- अपनी निजी तस्वीरें और जानकारी सोच-समझकर साझा करें। सार्वजनिक सामग्री का दुरुपयोग संभव है।
- संदिग्ध लिंक और ऐप से बचें। अनजान व्यक्ति के कहने पर ऐप इंस्टॉल न करें।
- महत्वपूर्ण अकाउंट पर दो-स्तरीय सुरक्षा चालू करें। अपना OTP या सुरक्षा कोड किसी को न बताएँ।
- मूल स्रोत और संदर्भ जाँचें। वीडियो कहाँ से आया, कब बनाया गया और पूरा बयान क्या था?
- फैक्ट-चेक संसाधनों का इस्तेमाल करें। लेकिन किसी एक टूल के परिणाम को अंतिम प्रमाण न मानें।
- संदिग्ध सामग्री की रिपोर्ट करें। खासकर जब उसमें धोखाधड़ी, धमकी या किसी की निजता का उल्लंघन हो।
निष्कर्ष: डिजिटल दुनिया में समझदारी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है
डीपफेक तकनीक ने तस्वीरों, वीडियो और आवाज़ के जरिए लोगों को गुमराह करने के नए रास्ते खोल दिए हैं। इससे गलत खबरें फैल सकती हैं, किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है और आर्थिक धोखाधड़ी भी हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर चीज नकली है या किसी भी वीडियो पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
जरूरत है कि हम डिजिटल सामग्री को समझदारी से देखें, स्रोत की जाँच करें और महत्वपूर्ण दावों की पुष्टि करें। कोई वीडियो बहुत भावनात्मक, सनसनीखेज या चौंकाने वाला हो, तो उसे तुरंत आगे भेजने के बजाय कुछ समय लेकर उसकी सच्चाई पता करें।
याद रखिए, किसी वीडियो का असली जैसा दिखना उसके सच होने का प्रमाण नहीं है। और किसी वीडियो में गड़बड़ी दिखना भी अपने आप में उसके नकली होने का अंतिम प्रमाण नहीं है।
इसलिए अगली बार जब आपके फोन पर कोई चौंकाने वाला वीडियो आए, तो उसे शेयर करने से पहले तीन सवाल जरूर पूछें:
- इसका मूल स्रोत क्या है?
- क्या किसी विश्वसनीय स्रोत ने इसकी पुष्टि की है?
- क्या इसे शेयर करने से किसी को नुकसान हो सकता है?
इन सवालों की आदत आपको और आपके परिवार को डिजिटल धोखाधड़ी तथा गलत सूचना से बचाने में मदद कर सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि डर, गुस्से या भावनाओं में आकर किसी सामग्री को तुरंत शेयर न करें। आपकी एक शेयर की हुई झूठी खबर किसी की प्रतिष्ठा बर्बाद कर सकती है, समाज में तनाव फैला सकती है या किसी को आर्थिक धोखाधड़ी का शिकार बना सकती है। इसके विपरीत, आपकी एक जिम्मेदार पहल किसी अफवाह को फैलने से रोक सकती है।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य सूचना और डिजिटल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी विशिष्ट वीडियो की फॉरेंसिक जाँच, व्यक्तिगत कानूनी सलाह या साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ की राय का विकल्प नहीं है। किसी संदिग्ध सामग्री की सत्यता का निर्णय करने से पहले विश्वसनीय स्रोतों से स्वतंत्र पुष्टि करें।
मोदी सरकार के 2014 से 2026 तक के 20 सबसे चर्चित विवाद, जो सरकार पर सवाल खड़े करते है
तो दोस्तों, अगर आप डिजिटल दुनिया में खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो इस लेख को दूसरों के साथ भी साझा करें। जागरूकता ही डीपफेक और फेक न्यूज़ के खिलाफ हमारी सबसे मजबूत ढाल है।
एक और बात,क्या आपने कभी किसी वायरल वीडियो या खबर पर भरोसा किया और बाद में पता चला कि वह नकली थी? अपना अनुभव कमेंट में बताएँ और ऐसे की महत्वपूर्ण बातें जानने के लिए हमारे साथ सोशल मीडिया पर भी जुड़े रहें।
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लेखक के बारे में
दिनेश नीर एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक है। जो 10 सालों से सोशल साइंस, मानव मनोविज्ञान, फ़िलॉसफ़ी और एआई से जुड़े खतरों पर अध्ययन कर रहें है। life ka doctor के माध्यम से इनका उद्देश्य है। रोजमर्या के जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान ढूँढना और पाठकों के लिए बिल्कुल आसान भाषा में प्रस्तुत करना। ताकि भारत के कम पढ़े-लिखे लोग भी आसानी से समझ सकें।




