मोक्ष का असली सच: पंडितो ने जो आपसे छुपाया: जानिये मोक्ष के 3 प्रकार

क्या मोक्ष सच में मरने के बाद मिलता है या यह सिर्फ सदियों से चला आ रहा एक भ्रम है? आखिर मोक्ष का असली सच क्या है? यह लेख ओशो, जे कृष्णमूर्ति, अष्टावक्र गीता और मेरे स्वयं के आत्मज्ञान पर आधारित है — जो आपको बताएगा मोक्ष यानी मुक्ति के तीन चरण: आर्थिक स्वतंत्रता, मानसिक मुक्ति और आत्मज्ञान। हो सकता है यह लेख आपकी अब तक की सारी मान्यताओं को तोड़ दे।

 

मोक्ष का असली सच: अगर जीते-जी मुक्त नहीं हुए तो मरने के बाद भी नहीं मिलेगा मोक्ष

आज मैं आपको मोक्ष का असली सच बताने जा रहा हूँ, जो आपकी सोच, धारणाओं और विश्वासों को झकझोर कर रख देगा। सदियों से धर्मगुरु, पादरी और पुरोहित हमें समझाते रहे हैं कि मरने के बाद इंसान को मोक्ष मिलता है। इसी विश्वास के सहारे वे हमें श्राद्ध, भोग, हवन, दान और तरह-तरह के कर्मकांड के नाम पर लूट रहे हैं।
लेकिन सच यह है कि मनुष्य को मोक्ष मरने करने के बाद नहीं बल्कि उसके को जीवन काल में ही मिलता है। अगर आप जीते-जी मुक्त नहीं हुए, तो मरने के बाद भी आपको मोक्ष नहीं मिलेगा।

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 नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम है दिनेश नीर और आज मैं आपको मुक्ति के उस मार्ग के बारे में बताने जा रहा हूँ जो तीन चरणों में पूरा होता है।
यह लेख ओशो, जे. कृष्णमूर्ति, अष्टावक्र गीता की शिक्षाओं और मेरे स्वयं के आत्मज्ञान पर आधारित है। मुझे पूरा यकीन है कि इस‌ लेख को पढ़ने के बाद आपका जीवन बदल जायेगा।


पहला चरण: आर्थिक स्वतंत्रता – मुक्ति की नींव

ओशो कहा करते थे कि गरीब व्यक्ति मुक्ति के बारे में सोच ही नहीं सकता — क्योंकि उसकी पहली जरूरत होती है भोजन। चाहे वह भोजन आजादी में मिले या गुलामी में। धार्मिक रूप से मिले या अधार्मिक रूप से। नैतिक रूप से मिले या अनैतिक रूप से। मनुष्य की सबसे पहली जरुरत रोटी, कपड़ा, मकान,और सुरक्षा है। और अपने और अपने परिवार की सुरक्षा और देखभाल करना उसका‌ सबसे पहला धर्म है। इन चीजों में संतुष्ट होने के बाद ही मनुष्य इससे आगे कुछ सोच सकता है।

और यह कड़वा सच है।

जब तक:

  • रोटी

  • कपड़ा

  • मकान

  • सुरक्षा

नहीं होती, तब तक मन अध्यात्म नहीं, सिर्फ संघर्ष में उलझा रहता है। इन तीन चीजों में संतुष्ट होने के बाद ही मनुष्य इससे आगे कुछ सोच सकता है। इसलिए सबसे पहले आपको आर्थिक रूप से आजाद होना होगा। सीधे शब्दो मे कहे तो आपके पास अपने और अपने परिवार की भैतिक जरुरतो को पुरा करने के लिये पर्याप्त रुप से पैसे होने ही चाहिये।

क्योंकि आज की दुनिया में अगर आपके पास पैसा नहीं है तो:

  • आपकी कोई वैल्यू नहीं

  • आपकी स्वतंत्रता सीमित है

  • आप मजबूरी में समझौता करते हैं

  • आपको मानसिक शांति नही मिलेगी
  • आप हमेशा संघर्ष और उलझन मे रहेंगे

आपको पारिवारिक और सामाजिक दबावों के आगे मजबूर हो कर समाज और व्यवस्था के झुकना पड़ेगा। आपको समाज के पारंपरिक विचारधारा और भ्रष्ट‌ कार्यप्रणाली को स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसलिए समाज के संगठित शक्ति का सामना करने के लिए आपको आर्थिक रूप से शक्तिशाली होना पड़ेगा। और आर्थिक शक्ति के लिए आर्थिक विकास अनिवार्य है। आर्थिक विकास के पश्चात ही आप प्रथम आजादी यानी आर्थिक आजादी पा सकते हैं। नोबल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध लेखक युवल नोवा हरारी कहते हैं कि प्रार्थनाएँ, सत्कर्म और ध्यानयोग से तत्कालिक राहत और उत्प्रेरणा तो मिल सकती है, लेकिन क्रांति, अकाल, महामारी और युद्ध जैसी समस्याओं का समाधान सिर्फ़ आर्थिक विकास की मार्फ़त ही हो सकता है।

इसलिए मुक्ति का पहला चरण है: आर्थिक आज़ादी।

अपने और अपने परिवार के लिए इतने पैसे कमा लो कि आपको विपरीत परिस्थितियों के लिए चिंतित नहीं होना पड़े। अगर आप उसके लिए सक्षम नहीं है तो रिल्स देखने में टाइम बर्बाद मत करो।

👉 खुद को शिक्षित करें
👉 स्किल सीखें
👉 बिज़नेस समझें
👉 कमाई के नए रास्ते बनाएं

👉 खुद को अमीर बनाएं।

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और जो लोग बहाना बनाते हैं कि मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूं तो मैं उनको बता दूं कि मैं खुद केवल पाँचवीं तक पढ़ा हूँ। 10 साल पहले इंटरनेट का मतलब भी पता नही था, और आज अपने सारे काम इंटरनेट से ही करता हूँ।  इंग्लिश किताबें पढ़ता हूँ बल्कि इंग्लिश में बुक भी लिखने वाला हूं। 
इसलिए बहाने छोड़िए —  पढ़िए और सीखिए, आगे बढ़िए और आत्मनिर्भर बनिए।

लेकिन ध्यान रहे:
पैसा कमाते समय अपनी आत्मा मत खोइए। बेईमानी और शोषण द्वारा ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा करने में मत लग जाइयेगा। 
वरना आप मुक्ति के दूसरे चरण में प्रवेश ही नहीं कर पाएँगे।

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दूसरा चरण: मानसिक मुक्ति – ज्ञात से स्वतंत्रता

आप सोचते होंगे कि आप जो सोचते हैं, जो निर्णय लेते हैं — वो आपका है। जो भी काम करते हैं। अपनी मर्जी से करते हैं। 
लेकिन यह आपका सबसे बड़ा बड़ा भ्रम है। सच्चाई यह है कि:

आपके विचार,  आपकी सोच आपकी नहीं हैं।
वे आपके अतीत, संस्कार, समाज और कंडीशनिंग का परिणाम हैं।

आपकी बुद्धि, आपका ज्ञान, सब  विभिन्न परंपराओं की, विभिन्न संस्कृतियों की, आपके अतीत के अनुभवों की,आपके संस्कारों की और सामाजिक विश्वासों की उपज है|

आप जो हैं, वो बना है:

  • परिवार की सोच से

  • समाज की मान्यताओं से

  • धार्मिक शिक्षा से

  • बीते अनुभवों से

बचपन से लेकर आज तक जो आपको बता दिया गया है| जो भी आपको किताबों में पढ़ाया गया है| जो भी आपने अपनी इंद्रियों से अनुभव किया है, वही चीज आपके मन में भरी पड़ी है। आपके मन में भरा सारा ज्ञान बासी और पुराना है। बल्कि जीवन वर्तमान में है। वर्तमान में सब कुछ बदल रहा है। जिंदगी हर पल बदल रही है, दुनिया बदल रही है। यहाँ कोई ज्ञान स्थाई नहीं है। मैं एक बार फिर दोहरा दूं कि दुनिया में कोई भी ज्ञान स्थाई नहीं है। इस दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान यही है कि परिवर्तन ही एक मात्र सत्य है। इस दुनिया में हर चीज लगातार बदलती जा रही है। और हम पुराने ज्ञान को पकड़े रहते हैं, जबकि जीवन हर पल नया हो रहा है। | मैं कुछ बता नहीं रहा हूं, आप खुद ही सोचो।

अतीत से मुक्ति

आपको बचपन में ही बता दिया गया था कि पूजा पाठ करने से भगवान खुश होते हैं, सुख शांति मिलती है। इसलिए आप मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, लेकिन कभी खुद से यह नहीं पूछते:

  • ईश्वर क्या है?

  • मैं कौन हूँ?

  • दुख क्यों है?

  • इतना पूजा पाठ करने के बावजूद जीवन में दुख ,परेशानी, दर्द, क्लेश, टकराव और उलझाव क्यों है?
  • हमारे दुख दूर क्यों नही हो रहे?
  • जीवन में सुख शांति और आनंद क्यों नहीं है?

आप एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं करते क्योंकि आपने तो सब कुछ पहले ही जान लिया है। सब कुछ आपको बता दिया गया है। आपने पहले ही किताबों में पढ़ लिया है कि आपके सारे दुख-दर्द आपके भाग्य की देन है और भाग्य का लिखा कोई नहीं मिटा सकता। सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है। आप बस वही पुरानी बातों को ही दोहराये चले जा रहे हैं। आपकी सारी आदतें, सारी गतिविधि पूरी तरह से यांत्रिक हो गई है। आपका मन अतीत के ज्ञान से भारी और बोझिल हो चुका है। जिसमे नई चीजो के लिये जगह ही नही है। आपको अपने मन को पुराने संस्कारो, परंपराओं, धारणाओं, अंधविश्वासों और पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा। आपको एक ऐसा मन चाहिये, जो बिल्कुल जीवंत हो, नवीन हो, ताजा हो। एक ऐसा मन जो अतीत पर निर्भर ना हो। जो हर पल सजग, सचेत और जागरुक हो।  ऐसे मन के साथ ही आप मुक्ति के अंतिम चरण में प्रवेश कर पाएंगे।

👉 सच्ची मुक्ति तब शुरू होती है जब आप पुराने संस्कारों, अंधविश्वासों और मानसिक बोझ से मुक्त होते हैं।

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तीसरा चरण: आत्मज्ञान – स्वयं से मुक्ति

अंतिम मुक्ति तब आती है जब आप अपने “मैं” से मुक्त हो जाते हैं।

अब आप कहेंगे कि हम “मैं” से मुक्त कैसे हो सकते हैं| “मैं”  के बिना मेरे अस्तित्व का क्या होगा। तो इसका जवाब है- अपने वास्तविक स्वरुप को जान कर। अभी मैं आपसे पूछूं कि आप कौन है तो आप अपना नाम बतायेंगे| लेकिन यह आप नहीं है। आप वह छवि है जो आपके विचार में आपके बारे में गढ़ लिया है और उस छवि को आपने  संसार की चीजों से रिश्तों से जोड़ लिया है|

आप कहते हैं:

  • मेरा धर्म

  • मेरा देश

  • मेरा परिवार

  • मेरी संपत्ति

  • मेरी पहचान

यही “मैं” ही बंधन बन जाता है। इसलिए आपकी सारी गतिविधि “मैं” के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। आप हर पल उसी “मैं” की सुरक्षा में लगे रहते हैं। अपने अहम को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं| आप जो कुछ भी करते हैं, अक्सर स्वार्थ से प्रेरित होता है — सुरक्षा, पहचान और संतुष्टि के लिए। फिर हम वहीं से सारी अव्यवस्था और समस्याएं खड़ी होती है। धीरे-धीरे आप इन चीजों के इतने गुलाम हो जाते हैं। क्योंकि आपकी कामनाएं और इच्छाएं मरते दम तक खत्म नहीं हो सकती। और जब तक आपका “मैं” भैतिक चीजों से जुड़ा रहेगा| तब तक आपको मोक्ष नहीं मिल सकता।

जब आप ध्यान की गहराई में जाने लगते हैं, तब  धीरे-धीरे आपका विवेक जग्रित होने लगता है और आपको बोध होने लगता है: कि आप अलग नहीं हैं, आप सम्पूर्ण अस्तित्व का हिस्सा हैं। यही आत्मज्ञान है।

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ध्यान से आत्मज्ञान कैसे मिलता है?

ध्यान कोई चमत्कार नहीं है।
ध्यान का मतलब है:
👉 स्वयं को देखना
👉 अपने विचारों को समझना
👉 अपनी भावनाओं का अवलोकन करना

जब आप खुद को ध्यानपूर्वक देखते हैं तो धीरे-धीरे अपने आप ही आपको बोध होने लगता है कि आप क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं और आपके कर्मों का परिणाम क्या मिल रहा है। जब आपके अंदर यह समझ विकसित हो जाती है तो आपको स्वयं एहसास हो जाता है कि आप कोई अलग अस्तित्व नहीं है, कोई अलग व्यक्ति नहीं है। आप एक विशाल चेतना का हिस्सा है, आप ही ईश्वर है और यह सारा संसार आपका है।

जब यह समझ विकसित होती है, तब: आपका

  • कर्म स्वार्थ से मुक्त हो जाता है

  • जीवन सहज हो जाता है

  • फिर उसके बाद आप जो भी करेंगे वह खुदगर्जी नहीं होगी

  • आपसे करुणा और प्रेम अपने आप बहेगी
  • आपके कर्म मन के द्वारा संचालित नहीं होंगे|

आप वास्तव में कोई कर्म नहीं करेंगे इसलिए ना कर्म का कोई बंधन होगा और ना कोई कर्म फल पैदा होगा| तब आप जीवन चक्र से पूरी तरह से मुक्त हो जाएंगे

यही मोक्ष है।
यही निर्वाण है।
यही जीवन की सर्वोच्च अवस्था है।

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निष्कर्ष: मोक्ष मरने के बाद नहीं, जीने की कला है

 मोक्ष कोई मृत्यु के बाद मिलने वाला इनाम नहीं।
मोक्ष है:

  • आर्थिक स्वतंत्रता

  • मानसिक स्वतंत्रता

  • आत्मज्ञान

और यह सब इसी जीवन मे हो सकता है। ओशो,, भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर, जीजस, महात्मा रमण और रामकृष्ण परम हंस जैसे महापुरुष अपने जीवन काल मे ही मुक्त हो गये थे। और अगर आप भी जीते-जी मुक्त नहीं हुए, तो मरने के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा।

मोक्ष से सम्बंधित सवाल-जवाब

Q1. क्या मोक्ष सच में मरने के बाद मिलता है?
उत्तर: नहीं, सच्चा मोक्ष जीवन की अवस्था है, जो आर्थिक स्वतंत्रता, मानसिक जागरूकता और आत्मज्ञान से प्राप्त होता है।

Q2. आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें?
उत्तर: आत्मज्ञान का अर्थ है, अपने वास्तविक स्वरुप का बोध-  स्वयं के विचारों, भावनाओं और व्यवहार का गहन अवलोकन करना, बिना जजमेंट के।

Q3. क्या पैसे के बिना आध्यात्मिक मुक्ति संभव है?
उत्तर: हाँ, संन्यासी जीवन में सम्भव है लेकिन व्यावहारिक जीवन में आर्थिक स्वतंत्रता के बिना लगभग असम्भव है, क्योंकि असुरक्षा में मन कभी शांत नहीं हो सकता।

Q4. ओशो के अनुसार मुक्ति क्या है?
उत्तर: ओशो के अनुसार मुक्ति है — जागरूक जीवन, कंडीशनिंग से बाहर निकलना और स्वयं का बोध।

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तो दोस्तो, आशा करते है कि अब आप मोक्ष का असली सच समझ गये होंगे। तो अगर आपको यह जानकारी पसंद आई है तो इसे अपने सोशल मीडिया ग्रुप्स में जरूर शेयर करें। हमारे साथ जुड़ने के लिए हमें Facebook, Instagram pintrest linkedin पर फॉलो करें और  life changing motivational videos देखने के लिये हमारे YouTube चैनल को सब्सक्राइब करें।

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