ईश्वर.. एक ऐसा सवाल है। जो सदियों से हमारे मन में गूंजता आ रहा है। ईश्वर को लेकर बहुत सारे सवाल हमारे मन में उठते रहते हैं। जैसे- ईश्वर क्या है? क्या वह कोई शक्ति है? कोई व्यक्ति हैं? या कुछ और है? ”क्या वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व है भी या यह महज एक विश्वास मात्र है। आज हम इन्ही सारे सवालो के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे।
is god real| क्या वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व है?
देखिए, वैसे तो साइंस ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है । सांइटिफिक रिसर्चों के अनुसार ब्रह्माण्ड का निर्माण बिग बैंग के विस्फोटक से हुआ है और हम सभी इंसानों सहित पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों का अस्तित्व किसी बायोलॉजिकल और केमिकल रिएक्शन का परिणाम है। लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि इस ब्रह्माण्ड के पीछे कोई ना कोई शक्ति जरूर है। अब आप उसे ईश्वर कहे, प्राकृति का नियम कहें, इनफाइनाईट एनर्जी कहें, कहें या सुप्रीम इंटेलिजेंस कहें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु इस सारी व्यवस्था के पीछे कोई तो शक्ति जरूर है। जो अज्ञात है। अपरिमेय है। जो तर्क़ और बुद्धि के समझ से परे है। हालांकि साइंस भी अपनी जगह पर सही है क्योंकि साइंस उन्हीं चीजों को मान्यता देता है जो उसके ज्ञात के भीतर आता है। जो उसकी प्रयोगशाला में प्रमाणित हो जाती हैं। परंतु ये भी सत्य है कि अज्ञात को ज्ञात द्वारा नहीं जाना जा सकता। और जो चीज ज्ञात के दायरे में आ जाये उसे ईश्वर कहना भी मुनासिब नहीं होगा। तो जहां तक मेरी समझ है। उसके अनुसार ईश्वर तो है लेकिन ईश्वर वह नहीं है जो सारी दुनिया समझ रही है। ईश्वर वह नहीं है जिसे लोगों ने मंदिरों मस्जिदों और गिरजाघरों में स्थापित कर दिया है। तो फिर क्या है ईश्वर?[what is god?] आइए समझते हैं।
what is god? ईश्वर क्या है?
ईश्वर क्या है यह समझने के लिए सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि ईश्वर क्या नहीं है। क्योंकि जिस ईश्वर को हम लोग मानते हैं। जिस ईश्वर को हमलोगों ने मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों में बिठा रखा है। मुझे लगता है कि वह ईश्वर नहीं है। वह हमारे मन का एक काल्पनिक विचार है, जो हमने अपने भय से बनाया है। अपने लालच से बनाया है। हम मृत्यु से डरते हैं, अकेलेपन से डरते हैं। दुःख से डरते हैं। अनिश्चितता से डरते हैं। इसलिए हम एक ‘सुरक्षित सत्ता’ की कल्पना पर विश्वास करते है। हम विश्वास करते हैं कि वह सर्वशक्तिमान हैं और किसी भी मुसीबत से हमारी रक्षा करने में समर्थ है। हम विश्वास करते हैं कि वह दयालु है और हमारे दुःखों और अकेलेपन में हमारा सहारा बनता है। इसी विचार को हम ‘ईश्वर’ कहते हैं।”
परंतु विचार क्या सत्य बन सकता है। विचार का तो खुद ही कोई अस्तित्व नहीं होता। विचार तो हमारे ही मन की उपज है। हम अपने मन में जो बीज डालते हैं। विचार उसी की उपज होती है। आप खुद ही गौर करके देखिए कि हर पल आपके मन में कितने विचार आते जाते हैं। लेकिन क्या केवल विचार करने से कोई चीज सत्य हो जाती है। और हमारा मन जो हमारे अहंकार से, हमारे भयों से, हमारे लालच से, हमारे स्वकेन्द्रित इच्छाओं से निर्मित हुआ है। क्या वह सत्य को जान सकता है। स्पष्ट है कि नहीं जान सकता। हां वह अपने ही तथाकथित ज्ञान पर आधारित कोई काल्पनिक विचार जरूर पैदा कर सकता है। जैसे कि ईश्वर का विचार। परंतु हम जानते हैं कि जिस विश्वास को हमने हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी पकड़ रखा है उसे इतनी जल्दी छोड़ने वाले नहीं हैं।
ईश्वर की उत्पत्ति कैसे हुई?
इसलिए आइए एक एक्जाम्पल से समझते हैं कि ईश्वर का यह विचार हमारे मन में कैसे पैदा हुआ था। कल्पना कीजिए कि मैं आज से एक लाख साल पहले आदिमानव युग में हूं। और मैं अपने साथियों के साथ शिकार की तलाश में जंगल में भटक रहा हूं। तभी आसमान में जोर से बिजली कड़कती है और मुझसे आगे चल रहे मेरे साथियों पर गिर जाती है। मेरे सामने ही मेरे साथी जल कर खाक हो जाते हैं। मैं बहुत ज्यादा डर जाता हूं और आसमान की तरफ देख कर सोचता हूं कि ऊपर जरूर कोई शक्ति है। जिसने मेरे साथियों को मार दिया है। मैं डर के मारे घुटने टेक कर नतमस्तक हो जाता हूं और प्रार्थना करता हूं कि कृपया मेरी जान बख्श दो। इस तरह मेरे मन में पहली बार इस दुनिया से परे किसी अलौकिक शक्ति का विचार जन्म लेता है।
इसी तरह एक दिन मैं धूप से तपती दोपहरी में भूखा प्यासा रेगिस्तान में भटक रहा हूं लेकिन कहीं भी पानी का नामोनिशान नहीं है। भूख प्यास और गर्मी से बेहाल ऐसा लग रहा है कि अब जान निकल जाएगी। मैं सोच रहा हूं कि काश कहीं से थोड़ा पानी मिल जाए। तभी अचानक बादल गरजते हैं और वर्षा होने लगती है। मेरी प्यास बुझ जाती है और गर्मी से राहत भी मिल जाती है। मैं खुश हो कर से आसमान की तरफ देखता हूं और सोचता हूं कि जरूर कोई शक्ति है। जो सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञाता है और दयालु भी है। जो हमसे नाराज होता है तो हमें दंड देता है और अगर वह हमसे खुश होता है तो हमारी इच्छाएं पूरी कर देता है। इस तरह उस अलौकिक शक्ति पर मेरा विश्वास और भी मजबूत हो जाता है।
तो मुझे लगता है कि इंसानों के मन में ईश्वर का विचार इसी तरह पैदा हुआ होगा। बाद में जब उनकी मानसिक बुद्धि और संवेदनशीलता और विकसित हुई होगी तो उनके मन में प्राकृतिक घटनाओं और स्वयं के अस्तित्व को लेकर सवाल पैदा हुए होंगे। जैसे, इस धरती, चांद सूरज और सितारों को किसने बनाया। हम इंसानों को किसने बनाया। हम कौन हैं, कहां से आते हैं और मरने के बाद कहां चले जाते हैं। ऐसे ही कई तरह के सवाल उनके मन में उठे होंगे। और कोई जवाब नहीं मिलने पर सब कुछ उस अलौकिक शक्ति से जोड़ दिया होगा। इस तरह हमने अपने आस पास के वातावरण और अपनी अपनी मानसिक छवियों के आधार पर ईश्वर, अल्लाह, गाॅड और अनेकों देवी देवताओं की एक काल्पनिक अवधारणा विकसित कर ली। फिर हमने अपने अपने सामुदायिक मान्यताओं के आधार पर उसके मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर इत्यादि बना लिये है। और कथित रूप से धार्मिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों द्वारा उसे पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सब चीजों से मानव जाति के दुःखित, व्यथित और अव्यवस्थित जीवन में कुछ सुधार हुआ है। बिल्कुल स्पष्ट है कि नहीं हुआ है। और क्या मनुष्य अपने सीमित ज्ञान वाले अशांत मन द्वारा उस असिमित और अज्ञात तत्व को ढूंढ सकता है। जाहिर है कि नहीं ढूंढ सकता।
परंतु विडंबना यह है कि हम अपने बच्चों को बचपन से ही परंपरागत तरीके से संस्कारित करना शुरू कर देते हैं कि ईश्वर ऐसा होता है तो ईश्वर वैसा होता है, मंदिर जाओ, तो भगवान मिलेंगे। मस्जिद जाओ तो अल्लाह मिलेंगे। पूजा करो नमाज पढ़ो। राम भगवान है तो कृष्ण भगवान है तो बुद्ध भगवान है। जबकि वास्तव में हम कुछ भी नहीं जानते कि भगवान क्या है और वह है भी या नहीं। बस किसी ने कह दिया या किसी किताब में पढ़ लिया और हमने मान लिया। और अपने बच्चों को भी कहते हैं कि ईश्वर को सारी दुनिया मानती है इसलिए तुम भी मान लो। परंतु मानने और जानने में बहुत बड़ा अंतर है। किसी चीज को अपने अनुभव से जाने बगैर मान लेना वास्तविकता से पलायन भर है। और कुछ नहीं। दरअसल यह हमारे मन का बना बनाया आरामदायक पैटर्न है। जब हमारा मन किसी समस्या को नहीं सुलझा पाता तो उससे पलायन करने की कोशिश करता है। इसी क्रम में वह कोई सस्ता सा विचार गढ़ लेता है। कोई काल्पनिक छवि गढ़ लेता है या कोई चालाकी भरा अविष्कार कर लेता है।
तो ‘ईश्वर’ परमात्मा या हम इसे जो भी नाम दें । हमारे मन का ही चालाकी भरा आविष्कार है, और हम उस आविष्कार को, धूपबत्ती से, कर्मकांडों से, तरह-तरह के विश्वासों, मतों से ढांपते रहते हैं। अनुशासन, त्याग, पूजा-पाठ, सदाचार- ये सभी बातें चाहे जितने श्रेष्ठ हों, विचार की प्रक्रिया ही हैं और यह सोचना एक भ्रम है कि हम सच में ईश्वर को खोज रहे हैं। सच तो यह है कि हम ईश्वर को सिर्फ इसलिए खोज रहे हैं क्योंकि हम सब इस संसार के दुःखों और इसकी तमाम दुर्गतियों से थक चुके हैं और कोई स्थाई सुरक्षा चाहते हैं। कोई सशक्त सहारा चाहते हैं। और निश्चित रूप से ईश्वर का विश्वास हमारे दुःख के क्षणों में एक सशक्त सहारा बनता है परन्तु यह भी वास्तविकता से पलायन ही है। इसलिए हम अपना ईश्वर खुद ही निर्मित कर लेते हैं। परंतु ज़ाहिर है कि मंदिरों का ईश्वर, पुस्तकों का ईश्वर, तो ईश्वर नहीं है, वह तो बस वास्तविकता से पलायन भर है। इसलिए हमें इस बारे में बहुत स्पष्ट होना होगा कि क्या ईश्वर की यह खोज पलायन मात्र है, अथवा यह सच में ईश्वर खोज है और यदि आप सच में ईश्वर को जानने में, ईश्वर की खोज में गंभीरता से रुचि रखते हैं तो आइए अब समझते हैं कि ईश्वर को कैसे जाना जा सकता है या यूं कहें कि सत्य और यथार्थ की खोज कैसे कर सकते है।
ईश्वर की खोज कैसे करें?
देखिए ईश्वर को जानने के लिए आपको किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या कहीं दूर जंगलों और पहाड़ों पर जाने की जरूरत नहीं है। ना ही आपको इसके लिए कोई ग्रंथ पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि यह आपके पास ही है आपके भीतर ही है। आप एक ही दृष्टि में सारी बात समझ सकते हैं। जब आप स्वयं को जान जाते हैं कि आप कौन हैं? जब आप अपने वास्तविक स्वरूप को जान जाते हैं। किसी हिंदू , मुसलमान या ईसाई के रूप में नहीं। ना ही किसी के पति, पुत्र या पिता के रूप में। बल्कि समग्र अस्तित्व के रूप में। जब आपको इस बात का एहसास हो जाता है कि आप पानी की एक बुंद नहीं है बल्कि पूरा का पूरा समंदर ही है। परंतु तभी ऐसा हो सकता है, जब हम अपने मन को, उसके छलावों, उसके पाखंडों और उसकी सारी-की-सारी कार्यप्रणाली को समझ लेंगे। जब हम अपनी सारी क्रियाओं, अपने सभी विचारों अपने संबंधों को स्पष्ट रूप से समझने में सक्षम हो जायेंगे, तभी हम अपने यथार्थ स्वरूप जान पायेंगे।
लेकिन यदि हमारा मन दुनियावी चीजों में ही दिग्भ्रमित हैं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, रिश्ते, विचार, द्वंद टकराव—तो हम उस यथार्थ को कैसे पा सकते हैं? जो मन भ्रमित, संस्कारग्रस्त व सीमित है। ऐसा मन यथार्थ या ईश्वर को कैसे जान सकता है? इसलिए यदि हम ईश्वर को जानना-समझना चाहते है, तो हमें अपने मन को संस्कारबद्धता से मुक्त करना होगा। जो भी ज्ञान अनुभव, संस्कार हमने अपने मन में इक्ट्ठा कर रखा है। उसके प्रति मर जाना होगा। ताकि हमारा मन बिल्कुल शांत, निश्छल और निर्मल हो जाये। हमें अपने मन के अंधेरे कमरे को साफ-सुथरा करना करना होगा। बंद पड़ी खिड़कियों को खोलना होगा ताकि ईश्वर का प्रकाश भीतर आ सकें।
ईश्वर एक प्रकाश है और प्रकाश को खोजना नहीं पड़ता। जो हम कर सकते हैं, वह इतना ही है कि हम उन रुकावटों को हटा दें, जो अंधेरा निर्मित करती हैं, बस उनका हटना ही उजाला होने के लिए काफी है। और यह सब करने का एकमात्र उपाय है, ध्यान ।
इसलिए हमारे साथ आप भी प्रतिदिन नियमित रूप से ध्यान करने का नियम बना लें। जिससे आपके मन में विचारों का शोर पूरी तरह से थम जाएं और आपका मन पूरी तरह शांत हो जाएं। क्योंकि जब मन पूर्ण रूप से शांत होता है, जब वह किसी विचार, किसी भय, किसी आशा से मुक्त होता है —तब एक गहन मौन उत्पन्न होता है। और उसी मौन में सत्य का अंकुर प्रस्फुटित होता है। और तभी उस हम ईश्वरीय अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। याद रखिए कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। कोई रूप नहीं है। यह एक ऐसी अवस्था है — जहाँ प्रेम है, करूणा है,मौन है। किसी अनुसासन या अभ्यास द्वारा ढाला गया प्रेम नहीं बल्कि जीवंत और निश्छल प्रेम। किसी एक के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण अस्तित्व के लिए प्रेम। जहां करुणा है, ऐसी करूणा जो सुरज की किरणों की तरह पुरे संसार पर बरसती है और ऐसा असीम मौन होता है। जिसमें परम आनंद की वर्षा होती है।
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तो दोस्तों, आशा करते हैं कि अब आपको समझ में आ गया होगा कि ईश्वर क्या है? [what is god? और उसे कैसे जाना जा सकता है। फिर भी अगर आपके मन में कोई सवाल है तो कृपया नीचे कमेंट करके जरूर बताएं। हम आपके सवाल का जवाब जरुर देंगे। दोंस्तो ये लेख आपको कैसा लगा हमे कमेन्ट करके जरूर बताये और अगर अच्छा लगा हो तो इसे अपने दोस्तों में शेयर करें। हमारे साथ जुड़ने के लिए हमें Facebook, Instagram pintrest linkedin पर फॉलो करें और हमारे YouTube चैनल को सब्सक्राइब करें।