हम अक्सर सरकारी दावों में विकास, तरक्की और आर्थिक खुशहाली की बातें सुनते हैं। लेकिन इन दावों के बीच उन मजदूरों की जिंदगी कहीं खो जाती है, जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए हजारों किलोमीटर दूर परदेश में काम करते हैं।
आज भी बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे गरीब राज्यों से लाखों पुरुष, महिलाएँ और बच्चे दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र तथा केरल जैसे अपेक्षाकृत संपन्न राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं। वहाँ वे कई बार बेहद कठिन, अपमानजनक और अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुजारने को मजबूर होते हैं। दो पैसे कमाने के लिए उन्हें किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, यह केवल वे ही जानते है।
इस कहानी (heart Touching Story in hindi) में हमने ऐसे ही गरीब मजदूरों के दुःख-दर्द, उनकी मजबूरियों और संघर्षों को चित्रित करने का प्रयास किया है।
और हाँ, यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। इसे लिखने से पहले हमने सैकड़ों गरीब मजदूरों से बातचीत की, उनके साथ रहकर काम किया और उनके दुःख-दर्द को करीब से महसूस करने की कोशिश की। उन्हीं अनुभवों और वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होकर यह कहानी लिखी गई है।
इसलिए इसे वास्तविक जीवन के अनुभवों पर आधारित कहानी के रूप में भी समझा जा सकता है।
20–30 minutes
रिक्शा वाला
दिनभर की मेहनत के बाद रेलवे स्टेशन के बाहर अपने रिक्शे पर आराम करते दो मजदूर भाई।
रात के बारह बज रहे थे। शहर की सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
दिनभर की भागदौड़ के बाद अधिकांश लोग अपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे।
लेकिन कुछ लोगों के लिए रात आराम का नहीं, बल्कि किसी तरह गुजारने का समय होती है।
रघु रिक्शे की पिछली सीट पर लेटा अपने फटे-पुराने चादर से पैरों को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
इधर मच्छरों के झूंड नीचे से लगातार हमले किए जा रहे थे।
“दिनभर अमीर लोग ख़ून चुसते है और रात को ये साले मच्छर।”
बड़बड़ाते हुए उसने पैर झटका।
“आह”
अगले ही पल उसकी चीख निकल गई।
उसका पैर साईकिल के हैंडल से टकराया था।
“तुझे तो कब से कह रहा हूं कि एक मच्छरदानी ले ले।”
बगल के रिक्शे पर लेटा बैजू काफी देर से उसके और मच्छरों के बीच हो रहे मुकाबले का मजा ले रहा था।
“हां तो तूं अपने रिक्शे में मच्छरदानी क्यों नहीं लगा लेता।”
रघु उसके बेतुके सलाह पर चिढ़ गया।
“अरे मेरे बदन में खून ही कहां है। जो ये कम्बखत चुसेगें।”
60 वर्षीय बैजू करवट लेते हुए बोला।
“उफ”
उसे बातों में उलझा देख एक मच्छर ने सुई चुभो दिया।
“तूं तो सराय में सोने जाता था। वहां क्यों नहीं गया।”
बैजू ने पुनः सवाल किया।
“क्या करें चाचा, वह सराय भी चोर उचक्कों का अड्डा बन गया है। कल रात ही किसी ने मेरे पाॅकेट से 500₹ निकाल लिए। दो दिन की कमाई थी। सोचा था कि 1000 पूरा कर के घर भेज दूंगा मगर…
मारे दुःख के रघु बात पूरी ना कर सका।
“तूं सामने स्टेशन पर क्यों नहीं चला जाता। वहां वेटिंग रूम में पंखा लगा हुआ। नींद अच्छी आएगी।”
रघु को दुखी देख बैजू अपना दुःख भुल गया।
लेकिन किसी ने टिकट मांगा तो…
रघु को बात पसंद आई किंतु वह डर रहा था।
“अरे इतने रात को कौन पुछता है” कोई पुछे तो बता देना कि सुबह ट्रेन पकड़नी है।”
रघु को ये बात पसंद आई।
लेकिन रात में मेरा रिक्शा कोई ले गया तो!
रघु ने शंका जाहिर की।
अरे जा.. कार और बाइक के में जमाने में तेरा रिक्शा कौन चुरायेगा। वैसे अगर तुझे डर है तो ला.. मैं अपने रिक्शे की जंजीर से तेरा रिक्शा भी जोड़ देता हूं।
बैजू ने आश्वस्त किया।
रेलवे स्टेशन बिल्कुल सामने ही चंद कदमों की दूरी पर था। कोयंबत्तूर जंक्शन काफी व्यस्त रेलवे स्टेशन है। रात को 12 बजे भी यात्रियों की अच्छी खासी भीड़ दिखाई दे रही थी। वह प्लेटफार्म के सबसे आखिरी छोर पर एक पंखे के नीचे शाल ओढ़कर लेट गया।
लेकिन काफी कोशिश करने के बावजूद भी उसे नींद नहीं आ रही थी।
“पता नहीं मेरा राहुल कैसा होगा, किस हाल में होगा। उससे बात किएं भी एक हफ्ते हो गए। पिछली बार बता रहा था कि कई दिनों से तबियत खराब है। मोबाइल में बैलेंस भी नहीं है कि उसका हालचाल पूछूं।”
सोचते-सोचते वह कब नींद का आगोश में समा गया पता ही नहीं चला।
उसने नींद से बोझिल आंखों को किसी तरह खोला तो देखा कि आर पी एफ का एक जवान हाथ में डंडा लिए प्लेटफार्म पर सोए यात्रियों को जगा रहा था। उसने मोबाइल निकाल कर टाइम देखा तो 1:00 बज रहे थे।
“यार अभी-अभी तो नींद लगी थी।”
वह उबासी लेते हुए बड़बड़ाया।
अभी वह दुबारा सोने को सोच ही रहा था कि वहीं पुलिसवाला दोबारा उसकी तरफ आता दिखाई दिया। जो डंडे से बाहर जाने का इशारा कर रहा था। उसे आते देख उसके आस-पास ऊंघाते यात्री जल्दी-जल्दी अपनी चादरें समेटने लगे।
रघु ने वहां से भागना ही उचित समझा।
अन्य यात्रियों के साथ वह भी बाहर निकल आया। उसने देखा कि बाहर स्टेशन परिसर में काफी यात्री सोए हुए थे। अधूरी नींद पूरी करने के लिए वह भी उनके बीच चादर बिछाकर सो गया। अभी उसे लेटे कुछ ही मिनट हुए होंगे तभी दो-तीन पुलिस वाले आए और सीटीयां बजाते हुए सभी सोए लोगों को जगाने लगे।
मारे नींद और परेशानी के वह दुख और गुस्से से भर गया।
वह उठा और अपने रिक्शे पर चला आया।
सच कहते हैं लोग, गरीबी की जिंदगी कुत्ते से भी बदतर होती है।
पता नहीं ये कैसा देश है। इससे अच्छा तो हमारा बिहार है। वहां तो अनेकों बेसहारों का ठिकाना रेलवे स्टेशन ही होता है। उसका मन अपने जन्मभूमि के प्रति सम्मान से भर गया।
लेकिन अगले ही पल उसकी आंखों के सामने बाढ़ से बर्बाद हुए फसलों का भयावह दृश्य गुजर गया।
Emotional Story in Hindi
“ई साल तऽ लागता धान के रोपनी भी ना होई।”
बाबूजी कल ही धान का बीज लेकर आए थे और आज सुबह उठ कर पिछवाड़े गए तो देखा कि खेतों में बाढ़ का पानी घुस आया था।
“तूऽऽ त हर साल इहे कहत रलऽऽ कि इस साल बाढ़ ना आई,ई का हऽ।”
रघु व्यंग्यात्मक लहजे में बोला।
बाबूजी चुप रह गएं।
वह कहते भी क्या। हर साल वे इसी उम्मीद में खेती करते की इस बार बाढ़ नही आयेगा लेकिन हर साल बाढ़ आकर उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देता।
रघु बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के एक छोटे से गांव का रहने वाला था।
छोटा सा वह गांव तीन भागों में बंटा हुआ था। जिसके एक भाग में मुस्लिम, दूसरे भाग में वैश्य और तीसरे भाग में दलित और हरिजन इत्यादि रहते थे।
मुस्लिम परिवारों के पास खेती लायक पर्याप्त जमीन थी। उनमें कुछ नौकरीपेशा लोग भी थे।
कुल मिलाकर उनमें से अधिकतर लोग सुखी- संपन्न थे।
हिंदू परिवारों में कुछ के पास थोड़ी बहुत ज़मीन थी तो कुछ के पास बिल्कुल नहीं थी।
यूं कहा जाए कि लगभग सभी गरीब ही थे। जिनमें से अधिकांश लोग दिल्ली, केरलपंजाब इत्यादि संपन्न राज्यों में जाकर मजदुरी करते थे। कुछ गांव के ही अन्य लोगों के खेतों में काम करने अपनी आजीविका चलाते थे।
उत्तर भारत गंडक नदी के तटवर्ती इलाकों की जमीन काफी उपजाऊ थी।
जिसमें लोग धान, गेहूं, गन्ना और दलहन इत्यादि की खेती करते थे।
परन्तु वह क्षेत्र बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके में आता था। जहां हर साल बाढ़ से भारी तबाही होती थी।
इस साल तो हद ही हो गई। लोगों को धान के बीज गिराने का भी मौका नहीं मिला और बाढ़ आ गई।
रघु के परिवार में मां-बाप, छोटे भाई, पत्नी और तीन बच्चों के साथ कुल आठ सदस्य थे।
ग़रीबी की वजह से रघु ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया था।
वह भी गांव के अन्य लोगों की तरह परदेश में जाकर मजदुरी करता।
लेकिन उसका सपना था कि उसका छोटा भाई पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।
इसके लिए रात-दिन वह कड़ी मेहनत करता। कुल मिलाकर जैसे तैसे परिवार का गुजारा चल रहा था।
तभी कोरोना महामारी सबके लिए इम्तिहान बनकर आ गया। लॉकडाउन लगने से सभी काम-धंधे प्रभावित हुए।
सबसे ज्यादा मार तो गरीबों पर पड़ीं। उनको तो खाने के लाले पड़ गए। रोजी-रोटी चलाने के लिए तक कर्ज लेना पड़ा। जिसके कारण साहूकार का कर्ज भी बढ़ गया। अब उनकी चिंता दोगुनी हो गई। अब परिवार का खर्च चलाए कि साहूकार का कर्ज चुकाए।
“देखल जाई,जवन काम मिली ऊ कईल जाई लेकिन अपना परिवार के गरीबी में ना मरे देम।
लेकिन इतना दूर!
अरे अपना गांव के बहुत लोग उहां रहे ला। सूनले बानी उहां दिहाड़ी भी ज्यादा बा।
लेकिन …
“अब रहे दऽ, ज्यादा सवाल जन करऽ. . . खाना लाव भुक लागल बा।”
वह उखड़ गया।
उषा मनमोस कर वहां से उठ गई।
“भैया, अबकी बार मैं भी चलूंगा आपके साथ”
राहुल इंटरमीडिएट कर चुका था। परंतु अभी लॉकडाउन की वजह से स्कूल-कॉलेज बंद होने के कारण कई महीनों से घर पर बेकार बैठा था।
“तूं क्या करेगा वहां जाकर”
“मैं. . . मैं तो कोई भी काम कर लूंगा।”
“नहीं तूं घर पर ही रह, यहां भी एक आदमी का रहना जरूरी है।
“भैया मैं जानता हूं कि घर की कंडीशन खराब है। आप अकेले क्या-क्या करेंगे। मैं चलूंगा तो आपकी भी कुछ मदद हो जाएगी, आखिर यहां भी तो बेकार ही बैठा हूं।”
रघु आगे कुछ नहीं बोल पाया।
वह जानता था कि राहुल सच कह रहा था।
तय समय पर उन्होंने ट्रेन पकड़ी और 48 घंटे के लम्बे सफ़र के बाद कोयंबत्तूर उतर गये।
रघु का एक रिश्तेदार कोच्चि में राईस मिल में काम करता था। उसने राहुल को अपने पास बुला लिया और अपने साथ हेल्पर में लगा लिया।
रघु को कोयंबत्तूर शहर बहुत पसंद आया इसलिए वह यहीं पर रुक गया।
यहाँ काम की तलाश में वह कई दिनों तक इधर-उधर भटकता रहा।
लेकिन इस अनजान शहर में कोई मुनासिब का नहीं मिल पाया। इसका मुख्य कारण तमिल भाषा का ना बोल और समझ पाना था। उत्तर भारतीय लोगों को दक्षिण भारत में यहीं समस्या होती है।
तभी एक दिन उसकी बैजू से मुलाकात हुई। वह भी बिहार का ही रहने वाला था।
उसने ही उसे अपने रिस्क पर रिक्शा दिलाया था। उसे रिक्शा चलना अच्छा तो नहीं लग रहा था लेकिन यहाँ से वापस घर लौट कर जाना इससे भी बुरा था। वैसे भी अब उसके पास कहीं आने-जाने के लिए किराया भी नहीं बचा था।
खैर अब उसे यहां रिक्शा चलाते हुए तीन महीने हो गए थे।
लेकिन रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं खोज पाया था। एक रिक्शा चालक जो दिनभर में बड़ी मुश्किल 400-500 कमाता हो। उसके लिए 5000₹ के किराए के रूम में रहना मुमकिन नहीं था। ऊपर से खाने-पीने का खर्च भी था।
अतः वह दिनभर रिकशा चलाता और रात को एक निजी ट्रस्ट द्वारा निर्मित सराय में जाकर सो जाता। और
आगे का किस्सा तो आप जानते ही हैं।
रिक्शा वाला— भाग 2
caption: दिनभर मेहनत करके यात्रियों को ढोता रघु, जिसकी जिंदगी संघर्ष और मजबूरी से भरी है।
“अरे कब तक सोयेगा”
बैजू ने झकझोर कर जगाया तो वह नींद की दुनिया से बाहर आ गया। सोचते-सोचते वह पता नहीं कब सो गया था।
वह आंखें मलते हुए उठा तो सुबह के आठ बज रहे थे।
मच्छरों के काटने से समूचे शरीर में खुजली हो रही थी। शौच भी लग आई थी।
उसने चादर को लपेट कर रखा और बोतल में पानी भर कर जंगल की ओर चला गया।
वापस आ कर हाथ मुंह धोकर हमेशा की तरह चाय बिस्कुट खाया मोबाईल में रिचार्ज कराया।
उसके बाद रिक्शा लेकर तैयार हो गया।
रिक्शे पर बैठा वह सवारी का इंतजार कर रहा था।
तभी उसका मोबाइल बजने लगा।
“हेलो”
घर का नंबर देखते ही उसने जल्दी से फोन काॅल उठाया।
“राउर फोन काहे ना लागत रहे, कै दिन से लगावत बानी।”
फोन उठाते ही पत्नी ने शिकायत की।
“बैलेंस खत्म हो गईल रलऽ, अभी ता रिचार्ज करईनीं हऽ. . . माई कहां बिया, ठीक बिया ना।”
फिर उसने बारी-बारी से मां और सभी बच्चों से बात की।
“याद बा की ना, कले किश्ती भरें के बा।”
काफी देर तक पत्नी बच्चों और मां से हाल-चाल उसने फोन रखना चाहा तभी ऊषा ने याद दिलाया।
“अरे हां! अच्छा आज शाम के हम 1000₹ डाल देम।”
“1000₹ ना कम से कम 1500₹ डाल देम काहे कि चावल, आटा, तेल सब खत्म हो गईल बा ऽ।”
ठीक बा, कोशिश करऽ तानि।”
कहते हुए उसने काॅल कट कर दिया।
शाम तक 1500₹ का व्यवस्था कैसे होगा।
फोन रखने के बाद वह सोच में पड़ गया।
Sad Story in Hindi
पिछले साल रमा की शादी में जो उसने 2 स्मॉल फाइनेंस कंपनियों से तीस-तीस हजार के दो लोन उठाए थे।
वे उसके जी का जंजाल बन चुके थे। हर महीने 7-8 हजार रुपए उसी में चले जाते थे।
“coming mam”
काफी देर इंतजार करने के बाद उसे दो महिलाएं अपनी तरफ आती दिखी तो वह झट में सीट से नीचे उतरा और रटा-रटाया डायलॉग मार दिया।
तमिल उसे आती थी इसलिए उसने अंग्रेजी के कुछ लाइन्स याद कर लिए थे।
वे दोनों महिलाएं रिक्शे पर बैठने जा ही रही थी कि एक ई रिक्शा आ कर रूकी।
रिक्शे वाले ने उनसे पता नहीं क्या कहा कि दोनों महिलाएं ऑटो में बैठ कर चली गई।
वह बेचारा देखता ही रह गया।
इस तेज रफ्तार वाली दुनिया में रिक्शे और टांगें को कौन पूछता है भला।
वह निराश हो कर रिक्शे की पिछली सीट पर बैठ गया और मोबाइल में छेड़छाड़ करने लगा।
ओ रिक्शा! ओ रिक्शा!
उसे किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी।
“गांधीपुरम चलोगे”
शायद वह भी कोई उत्तर भारतीय था।
“कितना लोगे”
उस अधेड़ व्यक्ति ने पूछा।
“आइए ना जो सही लगे दे दिजियेगा।”
जब भी उसे कोई हिंदीभाषी मिलता। वह एकदम दरियादिल हो उठता।
रिक्शा चलाने की आदत ना होने के कारण उसके कुल्हों पर फफोले पड़ गए थे। जिससे कारण उसे तीव्र जलन महसूस हो रही थी। ऊपर से बह तेज धूप में वह पसीने से तर-बतर किसी प्रकार दर्द को बर्दाश्त करके पैडल मारता जा रहा था।
“कितने हुए।”
करीब आधे घंटे के सफर के बाद वे गांधीपुरम पहुंच गए।
“वैसे तो यहां का 60₹ बनता है, आप 50₹ ही दे दीजिए।”
वह विनम्रता से बोला।
उस अधेड़ ने जेब से 20₹ का नोट निकाला और उसके हाथों में थमा कर जाने लगी।
“ये क्या अंकल जी बहुत घाटा लग जाएगा।”
“घाटा क्या लगेगा, तेरा क्या पेट्रोल जल गया है।”
लेकिन अंकल जी..
“अरे ठीक है, रख लें।
वह बेरुखी से कहता हुआ आगे बढ़ गया।
रघु का जी चाहा कि वह उस खूसट का मुंह तोड़ दे। लेकिन कुछ सोच कर वह खुन का घुंट पी कर रह गया।
आज का दिन उसके कमाई के लिहाज से अच्छा गुजरा था। दिनभर में करीब 700 रुपये की कमाई हुई थी।
आज का 700 और पहले का 500 = 1200 लेकिन अभी 300 रूपए कम थे।
उसमें से तो दो सौ रुपए रिक्शे का किराया भी देना था।
“चलो उसे कल ही दो दिन का इकट्ठे दे दूंगा। पहले बैजू अंकल से उधार ले कर भेज देता हूं।”
सोचते हुए वह उठ खड़ा हुआ। बैजू का इस दुनिया में कोई नहीं था। माँ-बाप तो बचपन में ही चल बसे। शादी के एक साल बाद पत्नी भी गुजर गई। एक बेटी थी, वह भी पिछले साल किसी लफंगे के साथ भाग गई।
उसे गांव गये साल भर हो चुके थे। वह दिनभर रिक्शा चलाता और रात को दो पैग मार कर रिक्शे पर पड़ जाता बैजू से पैसे लेकर उसने घर भेजे, तब जाकर उसे थोड़ा चैन मिला।
रात के लगभग आठ बज चुके थे। अब उसे भूख भी लग आई थी। वह उठा और सामने होटल में घुस गया।
“ये इडली डोसा और सांभर खाते खाते तो लगता है, घर जाने से पहले ही मर जाऊंगा।”
उसने बे-मन से इडली को मुंह में डालते हुए सोचा।
सचमुच उसने पिछले तीन महीने से कभी भी भरपेट भोजन नहीं किया।
उसे यहाँ का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था।
खाना खाने के बाद वह अपने रिक्शे पर बैठा था।
तभी उसे कुछ याद आया।
उसने तुरंत मोबाइल निकाल कर काॅल लगाया।
राहुल अभी-अभी ड्यूटी से आकर बिस्तर पर लेटा ही था कि उसका मोबाइल बजने लगा।
“हेलो कौन”
वह मोबाइल की स्क्रीन टूटी होने के कारण नंबर नहीं पहचान पाया।
“हेलो राहुल! कैसा है ये तू “
“प्रणाम भैया! मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं?
राहुल का बुझा हुआ चेहरा खिल उठा।
“अरे फोन क्यों नहीं करता है रे तू”
रघु ने उसे डांटते हुए बोला।
“मेरे मोबाइल का स्क्रीन टूट गया है। इसमें कुछ नहीं दिखता। बस काॅल सुन सकता हूं।”
“अरे कैसे टूट गया”
“वो काम करते वक्त हाथ से छूट गया।”
राहुल ने बताया।
“अच्छा ठीक है, बनवा लेना। अब ये बता कि काम कैसा है।”
रघु ने जानना चाहा।
कैसा है! ठीक ही है। लेकिन ड्युटी 12 घंटे की है और महीना है केवल 9000₹ हजार। उसमें से भी ठेकेदार का कमीशन कट जाता है।
राहुल मायूसी से बोला।
दरअसल उसका वहां बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। ऐसा लगता जैसे किसी जेल में कैद हो।
“अच्छा कोई बात नहीं, दिवाली तक किसी तरह काम कर लें, उसके बाद फिर मत आना।”
रघु ने सांत्वना दी।
लेकिन ठेकेदार कहता है कि दिवाली में कोई घर नहीं जाएगा। जो जायेगा उसे पैसा नहीं मिलेगा।
क्यों उसके बाप का राज है क्या?
हां समझिए उसका ही राज चलता है। कोई उसके खिलाफ कुछ नहीं बोल पाता।
“जरा बात करा तो उससे।”
छोड़िए ना, वो आपसे बात नहीं करेंगा। मैं कोई ना कोई उपाय लगा लूंगा। आप चिंता मत किजिए।” आप बताइए आपका काम कैसा है।
मुझे भी एक फैक्ट्री में अच्छा काम मिल गया। मेहनत भी ज्यादा नहीं है और 10-12 हजार रुपए आराम से बच जाते हैं।
चलिए बहुत अच्छा है।
राहुल खुश होते हुए बोला।
ठीक है, तुम ठेकेदार को बता देना के दिवाली में जाना है। मैं तुम्हारे लिए भी टिकट बुक कर लूंगा। और हां कोई दिक्कत हो तो मुझे किसी के मोबाइल से फोन कर देना, मैं चला आऊंगा।
ठीक है फोन रखता हूं।
अच्छा ठीक है।
फोन एक तरफ रख कर राहुल बिस्तर पर लेट गया। भाई से बात करके आज उसे बहुत सुकून मिला था। वरना फैक्ट्री के शोर-शराबे से तो वह पागल हो उठता था।
“कल ठेकेदार को साफ-साफ बता दूंगा कि मुझे दिवाली में जाना है।”
सोचते हुए वह गांव की दिवाली और छठ की पुरानी यादों में खो गया।
“कितना अच्छा है – गांव का जीवन। बस केवल बाढ़ ना आए तो हमें परदेश आने की क्या जरूरत।”
भाभी के हाथ की पूड़ी कचौड़ी और मां के हाथ के स्वादिष्ट ठेकुओं की कल्पना करके वह रोमांचित हो उठा। अबकी बार वह मुन्ना और रेशम के लिए ढेर सारे पटाखे खरीदगा।
उसे अपने भतीजे और भतीजी का ख्याल आया।
गांव के सुनहरे भविष्य की कल्पना करते-करते वह जल्द ही नींद की गहराइयों में खो गया।
“ठेकेदार साहब मुझे दिवाली में घर जाना है”
अगले दिन ठेकेदार के मिलते ही उसने अपने दिल की बात कह दी।
“क्या करेंगा दिवाली में जाकर, दिवाली के 15 दिन बाद चले जाना।”
ठेकेदार ने लापरवाही से कहा।
नहीं बरस-बरस के दिन पर मैं घर पर नहीं रहूंगा तो मेरी मां बहुत रोयेगी।
तो फिर क्यों आया, यहां मां के गोद में रहता”
ठेकेदार बेरुखी से बोला।
“मैं तो किसी भी हाल में जाऊंगा ही।”
तो भी जा, कौन रोकता है। मगर तेरे इस महीने के पैसे नहीं मिलेंगे।
ये तो कोई बात नहीं हुई, मैं मालिक से बात करूंगा।
राहुल ने थोड़ी सख्ती से कहा।
“तो फिर जा ना, यहां क्यों खड़ा हो।”
ठेकेदार ने भद्दी सी गाली दी।
अगली सुबह मिल मालिक ने राहुल को अपने ऑफिस में बुलाया और बहुत फटकारा। वो तो शुक्र है अजय का जो समय पर वहां पहुंच गया वरना वह हाथ भी उठा देता।
शायद ठेकेदार ने ही उसको कोई पट्टी पढ़ा दी थी।
“देखो राहुल समझते की कोशिश करो। हम इनसे झगड़ा करके जीत नहीं सकते। बस कुछ दिन की तो बात है, दिवाली बाद मेरे साथ ही चले चलना।”
अजय जो राहुल के मौसी का लड़का था और उसका हम-उम्र था।
“यार जब दिवाली छठ बीत ही जायेगी तो जाकर क्या करूंगा” वह बहुत गुस्से में था।
इतना गाली-गलौज सुनने के बाद उसका मन और भी नहीं लग रहा था।
ठीक है, अभी तो दिवाली को एक हफ्ते हैं। मैं बात करूंगा, तुम शांत हो जाओ।
एक सड़क दुर्घटना जिसने दो भाइयों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
दिवाली के ठीक चार दिन पहले उसका टिकट था। अजय ने पता नहीं कैसे बात करके ठेकेदार को मना लिया था।
परन्तु ठेकेदार ने उसके हिसाब में से तीन हजार रुपए काट लिए था। कहा कि छठ बाद वापस आने पर मिल जाएंगे। राहुल को बड़ी मुश्किल से इस जेल से आजाद होने का अवसर मिला था। इसलिए उसने भी ऐतराज नहीं जताया।
रघु ने उसे फोन करके बता दिया था कि एर्नाकुलम से ट्रेन या बस पकड़ कर सीधे कोयंबत्तूर चले आना।
वहां से दोनों भाई साथ चलेंगे। पर्व त्योहारों का दिन होने के कारण तत्काल टिकट मिल पाना मुश्किल था।
इसलिए उसने बस ही पकड़ ली।
कोयंबत्तूर बस स्टैंड से उतर कर उसने रेलवे स्टेशन के लिए ऑटो पकड़ लिया।
रेलवे स्टेशन के इस पार उतर कर वह मोबाइल कान से लगाए सड़क पार कर रहा था।
तभी अचानक एक कार तेज गति से सामने आ गई।
लेकिन उससे पहले की कार उसके शरीर को छुती सड़क के उस पार से किसी ने बिजली की फुर्ती से उसके ऊपर छलांग लगाई और उसे दूर ढकेल दिया।
यह सब इतनी तेजी से हुआ कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। थोड़ी ही देर में भीड़ जमा हो गई।
कार ड्राइवर कार छोड़कर भाग चुका था। रोड पर गिरने के कारण उसकी कोहनियां छिल गई थी।
किसी तरह कराहते हुए वह भीड़ को चीरता हुआ। उसने दिमाग पर जोर डाला और घने दाढ़ी-मूंछों के खून से सने चेहरे को पहचानने की कोशिश की। अगले ही पल वह शव से लिपट कर दहाड़े मार-मार कर रो रहा था।
वह रघु ही था जो सड़क के इस किनारे खड़ा उसका इंतजार कर रहा था।
चारों ओर से खड़े लोग अपना-अपना मोबाइल लिए तस्वीरें खीच रहे थे और वह भाई के शव से लिपटा रो रहा था।
कुछ ही मिनटों में जब पुलिस आ गई तो सब लोग वहां से खिसकने लगे।
“अरे ये तो वहीं रिक्शा वाला है। जो रेलवे प्लैटफॉर्म पर सोता था।”
किसी पुलिस वाले की आवाज उसके सुन्न होते कानों में पड़ी।
अगले ही पल होश खो कर गिर पड़ा
Heart Touching Hindi Story
उसने जब आंखें खोली तो खुद को अस्पताल में पाया। कैसे वह शव के साथ घर पहुंचा, कैसे दाह संस्कार हुआ उसे कुछ भी मालूम नहीं। पाँच दिन बाद बाद वह कोमा से बाहर आया था।
मां-बाबूजी, भाभी बच्चे सभी उसके आसपास बैठे थे। अजय भी उसके सिरहाने के पास बैठा नजर आया।
रघु भैया कहाँ हैं?”
लेकिन कोई जवाब नहीं दे रहा था।
उसने अजय से पूछा, “मेरे रघु भैया कहाँ हैं?”
आखिरकार उसे बताया गया कि रघु अब इस दुनिया में नहीं है।
यह सुनते ही राहुल की आँखों से आँसू बहने लगे।
पुलिस ने उसके मोबाईल से अजय में अजय का नंबर देख कर उसे कॉल करके हादसे की खबर दी थी। वही दोनों को घर तक लेकर आया था।
उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि एक कंपनी में बढ़िया काम मिल गया है।
वह फूट-फूटकर रो रहा था।
जिस भाई ने उसे बचाने के लिए अपनी जान दे दी, वह अब कभी उसके सामने नहीं आएगा।
राहुल के लिए यह स्वीकार करना असंभव था।
वह बार-बार रघु को याद करता और रोता रहता।
वह उस दृश्य की कल्पना करके तड़प उठा।
जब उसका भाई रिक्शा चलाता होगा।
जब वह रेलवे स्टेशनों पर सोता होगा।
जब उसके खुबसूरत चेहरे को कार ने रौंदा होगा।
वह भाभी के पैरों में गिर कर लागातार रोते ही चला जा रहा था। लेकिन आखिर कोई कब तक रो सकता है। किसी के चले जाने से ज़िंदगी रुक तो नहीं जाती।
तेरहवी होने के बाद धीरे-धीरे ज़िंदगी पटरी पर लौटने लगी।
“भाई, इस दुनिया में गरीबी से बढ़कर कोई पाप नहीं है। गरीब आदमी की ज़िंदगी कुत्ते की ज़िंदगी होती है। इसलिए हमें किसी भी हाल में गरीबी के दलदल से बाहर निकालना है ।”
राहुल को हमेशा रघु की बातें याद आती।
रघु अक्सर अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करता था। वह चाहता था कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी जिंदगी जिएँ और उन्हें उसकी तरह मजदूरी करने के लिए मजबूर न होना पड़े।
लेकिन अब रघु नहीं था।
उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
उसके बच्चों का भविष्य क्या होगा?
इन सवालों ने राहुल को भीतर तक झकझोर दिया।
उसने मन ही मन एक संकल्प लिया।
“भैया, आपने मेरी जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी। मैं आपकी इस कुर्बानी को कभी नहीं भूलूँगा। अब आपके बच्चों की जिम्मेदारी मेरी है।”
राहुल ने तय किया कि वह अपने भतीजे को पढ़ाएगा और अपनी भतीजियों की शादी करवाएगा।
उसने यह भी फैसला किया कि जब तक उसके भतीजे की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती और भतीजियों की शादी नहीं हो जाती, तब तक वह खुद शादी नहीं करेगा।
अब उसकी जिंदगी का उद्देश्य बदल चुका था।
उसने फिर में पढ़ाई चालू कर दी। अब वह दिनभर पास के कस्बे में मजदूरी करता और रात को पढ़ाई करता। दिल लगाकर काम करने के कारण बहुत जल्द ही वह कुशल कारीगर बन गया। जिसके चलते उसे ज्यादा पैसे मिलने लगे और घर की हालत भी सुधरने लगी।
काम के बाद शरीर थक जाता था। कभी आँखें नींद से बोझिल हो जातीं, तो कभी किताबों के सामने बैठकर उसे नींद आने लगती।
फिर भी वह पढ़ाई नहीं छोड़ता।
उसके मन में रघु का चेहरा घूमता रहता।
वह सोचता, “अगर भैया आज जीवित होते, तो कितना खुश होते!”
राहुल ने परिवार का खर्च चलाते हुए पढ़ाई भी जारी रखी। और बच्चों को भी पढ़ाना जारी रखा।
समय बीतता गया।
एक साल, दो साल, तीन साल…
राहुल ने अपनी जिंदगी को पूरी तरह बदलने के लिए संघर्ष किया।
पांच साल बाद
“राहुल अब तऽ शादी करबऽ ना।”
भाभी ने उसके माथे पर टिका लगाते हुए पुछा।
आज रघु की पांचवीं बरसी थी और इसी मौके पर उसका बिहार पुलिस में दरोगा के पद पर सलेक्शन हो गया था।
इसी खुशी में एक छोटी सी पार्टी दी गई थी। सभी मेहमान आए हुए थे।
पूरे परिवार में खुशी का माहौल था। मां और बाबूजी भी बहुत खुश थे।
आखिरकार वे गरीबी के दलदल से बाहर निकल गए थे।
“बोलत काहे नईखऽ।”
अबकी बार मां ने उसे टोका।
नहीं भाभी! अभी मेरा काम अधूरा है। अभी मुन्ना को एसीपी बनाना है। अभी किरण और नेहा की शादी करनी है और गांव को ऐसा बनाना है कि किसी को परदेश जाकर मजदुरी ना करनी पड़े
अभी मेरा सफ़र बहुत लंबा है। तब तक आपलोगो को इंतजार करना पड़ेगा।
आप लोग मुझे आशीर्वाद दिजिए कि मुझे अपने सफर में सफलता मिलें।
वह भाभी, मां और बाबूजी के पांव छुते हुए बोला।
सभी मेहमानों से निपट कर वह छत पर चला आया।
रात के बारह बज रहे थे।
चांद पूरी ताकत से चमक रहा था। उसने ध्यान से चांद को देखा तो ऐसा लगा कि चाँद के भीतर रघु मुस्करा रहा है।
उसके आंखों से कुछ मोती टूटे और होंठों पर आकर रूक गए।
अनायास ही उसकी होंठों से निकल पड़ा।
“भैया अब आप खुश तो हो ना”
समाप्त
कहानी का संदेश
दोस्तों, यह कहानी केवल रघु और राहुल की कहानी नहीं है। यह उन लाखों मजदूरों की कहानी है, जो अपने परिवार की खुशी के लिए अपना जीवन खपा देते हैं।
यह उन लोगों की कहानी है, जो त्योहारों पर अपने घर नहीं पहुँच पाते। उन बच्चों की कहानी है, जो अपने पिता के इंतजार में बड़े होते हैं। उन परिवारों की कहानी है, जिनकी खुशियाँ किसी दूसरे शहर में मजदूरी करने वाले इंसान के पसीने पर निर्भर होती हैं।
रघु ने राहुल को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। उसका बलिदान हमें याद दिलाता है कि इंसानियत, प्रेम और त्याग किसी भी पद, पैसे या प्रतिष्ठा से कहीं अधिक मूल्यवान हैं।
दिनेश नीर, Life Ka Doctor के संस्थापक और लेखक हैं। वे पिछले 8 सालों से आसान हिंदी भाषा में मानसिक शांति, अध्यात्म, अच्छी आदतें, अनुशासन, नींद, थकान और जीवन मार्गदर्शन से जुड़े उपयोगी लेख साझा कर रहें हैं।