मोदी सरकार के 2014 से अब तक के 20 सबसे चर्चित विवाद, फैसले और आलोचनाएँ

मोदी सरकार के 20 सबसे विवादित फैसले और घटनाएँ क्या हैं?

यह उन प्रमुख नीतियों, सरकारी निर्णयों और घटनाओं का संकलन है, जिन पर 2014 से 2026 के बीच व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस हुई। इस लेख में प्रत्येक विषय पर आलोचकों के तर्क, सरकार का पक्ष और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तथ्यात्मक  विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।


साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तब करोड़ों लोगों ने उनसे बड़ी उम्मीदें लगाई थीं|

भ्रष्टाचार पर लगाम, तेज़ आर्थिक विकास, युवाओं के लिए रोजगार, बेहतर बुनियादी ढाँचा और भारत को वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान दिलाने जैसे कई वादों के साथ उनकी सरकार सत्ता में आई।

पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए, जिनकी देश और विदेश में सराहना भी हुई। डिजिटल इंडिया, UPI, सड़क और एक्सप्रेसवे निर्माण, रेलवे के आधुनिकीकरण और कई कल्याणकारी योजनाओं को सरकार की बड़ी उपलब्धियों के रूप में देखा जाता है।

लेकिन विपक्षी दलों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र संगठनों और कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सरकार की कई नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कुछ फैसले जल्दबाज़ी में लिए गए, कुछ नीतियों का असर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा क्योंकि उनमें पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही नहीं बरती गई और कुछ मामलों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर चिंताएँ सामने आईं। हालांकि सरकार इन बातों से हमेशा ही इनकार करती आई है लेकिन जब सवाल उठा है तो उसका जवाब ढूंढना भी जरूरी है । 

इसलिए आज हम मोदी सरकार के कार्यकाल का पूरे विस्तार विश्लेषण का करने जा रहे है | यहाँ हम उन 20 प्रमुख मुद्दों को समझेंगे जिन्हें विपक्ष और राजनीतिक विशेषज्ञ मोदी शासनकाल की सबसे बड़ी गलतियाँ या विवादित निर्णय मानते हैं। इस लेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है। इसलिए जहाँ उचित होगा वहाँ सरकार का पक्ष भी रखा जाएगा, ताकि पाठक दोनों दृष्टिकोणों को समझकर अपनी राय बना सकें।


Table of Contents

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख किसी राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा के समर्थन अथवा विरोध के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल उन प्रमुख आलोचनाओं और विवादों का तथ्यपरक एवं संतुलित संकलन प्रस्तुत करना है जो सार्वजनिक विमर्श, न्यायिक कार्यवाहियों, संसदीय बहसों, सरकारी दस्तावेज़ों और विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों का हिस्सा रहे हैं।

जहाँ भी किसी विवाद, आरोप या आलोचना का उल्लेख किया गया है, वहाँ संबंधित पक्ष—सरकार, न्यायालय या अन्य संस्थाओं—का दृष्टिकोण भी शामिल करने का प्रयास किया गया है। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और पाठक के स्वतंत्र विवेक पर आधारित होना चाहिए।


1. नोटबंदी (Demonetisation) – मोदी सरकार का सबसे विवादित फैसला

8 नवंबर 2016 की रात को 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में घोषणा की कि उसी रात 12 बजे से ₹500 और ₹1000 के पुराने नोट वैध नहीं रहेंगे। उस समय प्रचलन में मौजूद लगभग 86% मुद्रा एक झटके में अमान्य हो गई। सरकार ने लोगों को पुराने नोट बैंक में जमा कराने और सीमित मात्रा में नए नोट निकालने की अनुमति दी।

सरकार ने इस निर्णय के पीछे कई उद्देश्य बताए। इनमें काले धन पर रोक लगाना, नकली नोटों के नेटवर्क को खत्म करना, आतंकवाद की फंडिंग रोकना और देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर तेज़ी से बढ़ाना प्रमुख थे।

आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

सरकार के इस फैसले की विपक्ष, कई अर्थशास्त्रियों और स्वतंत्र विश्लेषकों ने कई आधारों पर आलोचना की।

1. लगभग पूरा पैसा वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आया

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, अमान्य किए गए नोटों का लगभग 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बैंकिंग प्रणाली में वापस जमा हो गया।

आलोचकों का कहना है कि यदि अधिकांश नकदी वापस आ गई, तो यह मानना कठिन है कि बड़ी मात्रा में काला धन नकदी के रूप में नष्ट हुआ। उनके अनुसार इससे यह धारणा कमजोर हुई कि नोटबंदी से काले धन पर निर्णायक प्रहार हुआ। जबकि सरकार को भी पता था कि देश के काले धन का अधिकांश हिस्सा स्विस बैंक में जमा था| फिर अपने देश में नोटबंदी करने का क्या तुक था |

2. छोटे व्यापार और असंगठित क्षेत्र को बड़ा झटका

भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा नकद लेन-देन पर आधारित था। छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर, किसान, कुटीर उद्योग और सूक्ष्म व्यवसाय अचानक नकदी संकट में आ गए।

कई उद्योग संगठनों और स्वतंत्र अध्ययनों में यह कहा गया कि लाखों छोटे कारोबारों की बिक्री प्रभावित हुई और कई अस्थायी रूप से बंद भी हुए।

आलोचकों का कहना है कि इस क्षेत्र को हुए नुकसान की भरपाई करने में कई महीने लगे।

3. रोजगार पर असर

कुछ श्रम और आर्थिक अध्ययनों में दावा किया गया कि नोटबंदी के बाद विशेषकर असंगठित क्षेत्र में रोजगार प्रभावित हुआ।

चूंकि निर्माण कार्य, छोटे उद्योग और नकद भुगतान पर निर्भर व्यवसायों में गतिविधियाँ धीमी हुईं, इसलिए कई श्रमिकों को अस्थायी रूप से काम छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा।

4. आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हुई

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नोटबंदी के बाद कुछ तिमाहियों में आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

नकदी की कमी के कारण उपभोग, निवेश और व्यापारिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।

हालाँकि यह भी सच है कि अर्थव्यवस्था पर उस समय वैश्विक परिस्थितियों और अन्य घरेलू कारकों का भी प्रभाव था, इसलिए केवल नोटबंदी को सभी आर्थिक बदलावों का कारण मानना सरल निष्कर्ष होगा।

5. बैंक और आम नागरिकों पर भारी दबाव

नोटबंदी के बाद कई सप्ताह तक बैंक और एटीएम के बाहर लंबी कतारें देखी गईं। देश भर से कतारों में खड़े वृद्ध और कमजोर लोगों के मरने की खबरें भी आई| 

लोगों को सीमित नकदी निकालने की अनुमति थी। ग्रामीण क्षेत्रों में नए नोटों की उपलब्धता और बैंकिंग सुविधाओं की कमी के कारण कठिनाइयाँ और बढ़ गईं।

आलोचकों का कहना है कि नीति की तैयारी पर्याप्त नहीं थी।


निष्कर्ष

नोटबंदी आज भी भारत की सबसे चर्चित आर्थिक नीतियों में से एक है।

आलोचक इसे आर्थिक दृष्टि से महंगा और अपेक्षित परिणाम न देने वाला निर्णय मानते हैं, जबकि सरकार इसे कर अनुपालन बढ़ाने, डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देने और वित्तीय पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताती है। हालाँकि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इनमें से कुछ बदलाव अन्य नीतियों, तकनीकी प्रगति और बाद के सुधारों के कारण भी हुए, इसलिए इन सभी उपलब्धियों का पूरा श्रेय केवल नोटबंदी को देना उचित नहीं होगा।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि जिस काले धन पर कार्रवाई का दावा करते हुए सरकार ने नोटंबदी का ऐलान किया था लेकिन काला धन कहां गया? उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया ? मोदी सरकार के पास इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं है ?

यही कारण है कि लगभग एक दशक बाद भी नोटबंदी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर होने वाली बहसों का प्रमुख विषय बनी हुई है।


2. जीएसटी (GST) – ऐतिहासिक कर सुधार या छोटे कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती?

1 जुलाई 2017 को भारत में वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax – GST) लागू किया गया। इसे आज़ादी के बाद देश का सबसे बड़ा कर सुधार माना गया। इसका उद्देश्य था कि केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले कई अलग-अलग अप्रत्यक्ष करों—जैसे वैट (VAT), एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एंट्री टैक्स और ऑक्ट्रॉय—को समाप्त करके पूरे देश में “एक राष्ट्र, एक कर” (One Nation, One Tax) व्यवस्था लागू की जाए।

सरकार का कहना था कि इससे टैक्स प्रणाली सरल होगी, टैक्स चोरी कम होगी, कारोबार करना आसान होगा और पूरे देश में एक समान बाजार (Common Market) तैयार होगा।

हालाँकि, जीएसटी लागू होने के बाद विपक्ष, व्यापारिक संगठनों और कई अर्थशास्त्रियों ने इसकी संरचना और क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठाए।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. जल्दबाज़ी में लागू करने का आरोप

जीएसटी लागू होने के शुरुआती महीनों में पोर्टल की तकनीकी समस्याएँ, नियमों में लगातार बदलाव और बार-बार नई अधिसूचनाएँ जारी होने से व्यापारियों में भ्रम की स्थिति बनी रही।

छोटे और मध्यम व्यवसायों का कहना था कि वे नई प्रणाली के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। कई व्यापारियों को चार्टर्ड अकाउंटेंट की मदद लेनी पड़ी, जिससे उनका खर्च बढ़ गया।

आलोचकों का कहना है कि यदि सरकार कुछ और समय तैयारी में लगाती, तो शुरुआती अव्यवस्था कम हो सकती थी।


2. छोटे व्यापारियों पर अनुपालन (Compliance) का बोझ

जीएसटी लागू होने के बाद व्यापारियों को नियमित रूप से ऑनलाइन रिटर्न भरने, ई-वे बिल बनाने, इनवॉइस मिलान (Invoice Matching) और डिजिटल रिकॉर्ड रखने जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ा।

बड़े उद्योगों के लिए यह अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन छोटे दुकानदारों, किराना व्यापारियों और ग्रामीण व्यवसायों के लिए यह नई व्यवस्था चुनौतीपूर्ण साबित हुई।

कई व्यापारिक संगठनों ने कहा कि कारोबार चलाने से ज्यादा समय कागजी और डिजिटल औपचारिकताओं में लगने लगा।


3. कई टैक्स स्लैब होने पर सवाल

जीएसटी को “एक राष्ट्र, एक कर” कहा गया, लेकिन व्यवहार में इसमें कई कर दरें रखी गईं—0%, 5%, 12%, 18% और 28%।

आलोचकों का कहना है कि जब इतनी अलग-अलग दरें हैं, तो इसे वास्तव में “एक कर” कहना पूरी तरह सही नहीं है।

कई बार यह तय करना भी मुश्किल हो जाता था कि किसी उत्पाद पर कौन-सी दर लागू होगी। कुछ वस्तुओं पर टैक्स दरों को लेकर विवाद भी सामने आए।


4. छोटे उद्योगों और एमएसएमई पर असर

भारत की अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) रोजगार का बड़ा स्रोत हैं।

कई उद्योग संगठनों ने दावा किया कि जीएसटी के शुरुआती वर्षों में छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी (Working Capital) प्रभावित हुई क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit) मिलने में देरी होती थी।

नकदी प्रवाह (Cash Flow) की समस्या के कारण कुछ छोटे उद्योगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।


5. राज्यों की आय और संघीय ढांचे पर बहस

जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों की कर प्रणाली में बड़ा बदलाव आया।

कई राज्यों ने आरोप लगाया कि जीएसटी मुआवजा (GST Compensation) समय पर नहीं मिला, जिससे उनके वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ा।

विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान यह मुद्दा काफी विवादित रहा।


6. बार-बार नियम बदलने की आलोचना

जीएसटी लागू होने के बाद शुरुआती वर्षों में कर दरों, रिटर्न फॉर्म और प्रक्रियाओं में कई बार बदलाव किए गए।

आलोचकों का कहना है कि लगातार बदलते नियमों के कारण व्यापारियों और कर सलाहकारों के लिए व्यवस्था को समझना कठिन हो गया।


निष्कर्ष

जीएसटी भारत के सबसे महत्वाकांक्षी आर्थिक सुधारों में से एक है।

आलोचकों का कहना है कि इसकी अवधारणा अच्छी थी, लेकिन इसे लागू करने का तरीका और शुरुआती तैयारी पर्याप्त नहीं थी, जिससे छोटे व्यापारियों और उद्योगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

इसी कारण जीएसटी आज भी मोदी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों और सबसे अधिक विवादित नीतियों—दोनों में गिना जाता है।


3. बेरोज़गारी और रोजगार का संकट – क्या वादों के अनुरूप नौकरियाँ बन पाईं?

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में रोजगार सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में से एक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तेज़ आर्थिक विकास, औद्योगिक विस्तार और उद्यमिता को बढ़ावा देकर युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने की बात कही थी। “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी कई योजनाओं का उद्देश्य भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार बढ़ाना था।

लेकिन पिछले एक दशक में रोजगार का मुद्दा लगातार राजनीतिक और आर्थिक बहस का विषय बना रहा। विपक्ष, कई अर्थशास्त्रियों, श्रम विशेषज्ञों और छात्र संगठनों का आरोप है कि सरकार रोजगार सृजन के अपने वादों पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। वहीं सरकार का कहना है कि रोजगार को केवल सरकारी नौकरियों से नहीं मापा जा सकता और नई अर्थव्यवस्था में स्वरोजगार (Self-employment), डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्टार्टअप और बुनियादी ढाँचे के निर्माण से करोड़ों अवसर पैदा हुए हैं।

यही कारण है कि बेरोज़गारी आज भी मोदी सरकार की सबसे चर्चित आलोचनाओं में शामिल रहती है।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. युवाओं में बेरोज़गारी लगातार बड़ा मुद्दा बनी रही

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। हर साल लाखों छात्र कॉलेजों, आईटीआई, पॉलिटेक्निक और विश्वविद्यालयों से पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं।

आलोचकों का कहना है कि अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से रोजगार नहीं पैदा कर सकी, जितनी तेज़ी से श्रम बाजार में नए युवा प्रवेश कर रहे थे।

कई स्वतंत्र अध्ययनों और सर्वेक्षणों में युवाओं के बीच बेरोज़गारी की दर सामान्य औसत से अधिक बताई गई। विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में रोजगार की चुनौती को गंभीर माना गया।


2. सरकारी नौकरियों की कमी

सरकारी नौकरी आज भी भारत के करोड़ों युवाओं का सपना है। स्थायी आय, सामाजिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा के कारण हर भर्ती में लाखों उम्मीदवार आवेदन करते हैं।

आलोचकों का आरोप है कि कई मंत्रालयों और सरकारी विभागों में वर्षों तक लाखों पद खाली रहे।

इसके अलावा, कई भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, परिणामों में विलंब और न्यायालयों में लंबित मामलों के कारण उम्मीदवारों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।

कई राज्यों में भी भर्ती घोटालों और परीक्षा रद्द होने की घटनाओं ने युवाओं में असंतोष बढ़ाया।


3. “मेक इन इंडिया” से अपेक्षित रोजगार नहीं मिलने की आलोचना

2014 में शुरू किए गए “मेक इन इंडिया” अभियान का उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण (Manufacturing) केंद्र बनाना था।

उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में विदेशी कंपनियाँ भारत में निवेश करेंगी और लाखों नई नौकरियाँ पैदा होंगी।

आलोचकों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में निवेश बढ़ा, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार उम्मीद के अनुरूप नहीं हुआ और रोजगार सृजन भी लक्ष्य के स्तर तक नहीं पहुँच सका।


4. रोजगार की गुणवत्ता पर सवाल

आलोचकों का कहना है कि केवल रोजगार की संख्या नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।

उनका तर्क है कि कई नए रोजगार अस्थायी (Temporary), अनुबंध आधारित (Contractual) या कम आय वाले हैं।

गिग इकोनॉमी (जैसे ऑनलाइन डिलीवरी, कैब सेवाएँ और फ्रीलांस कार्य) ने अवसर तो दिए हैं, लेकिन इनमें सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और स्थायी आय जैसी सुविधाएँ सीमित हैं।


5. कोविड-19 का रोजगार पर प्रभाव

2020 में कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण लाखों लोगों की नौकरियाँ प्रभावित हुईं।

निर्माण, पर्यटन, होटल, छोटे उद्योग, परिवहन और खुदरा व्यापार जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

आलोचकों का कहना है कि महामारी से पहले भी रोजगार की स्थिति मजबूत नहीं थी और लॉकडाउन ने समस्या को और गहरा कर दिया।


6. महिलाओं की श्रम भागीदारी

कई विशेषज्ञों ने महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी (Female Labour Force Participation) को लेकर भी चिंता जताई।

आलोचकों का कहना है कि भारत में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएँ रोजगार से बाहर हैं।

हालाँकि हाल के वर्षों में कुछ आधिकारिक सर्वेक्षणों में महिला श्रम भागीदारी में सुधार के संकेत भी मिले हैं, लेकिन इस विषय पर अलग-अलग आँकड़ों और उनकी व्याख्या को लेकर बहस जारी है।


7. प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर असंतोष

हाल के वर्षों में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और परिणामों के लंबे इंतजार ने युवाओं के बीच नाराज़गी बढ़ाई।

विपक्ष का आरोप है कि लाखों उम्मीदवार वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन समय पर नियुक्तियाँ नहीं हो पातीं।


अर्थशास्त्रियों की राय

रोजगार को लेकर विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है।

कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में रोजगार सृजन की गति अभी भी आबादी की जरूरतों से कम है और विनिर्माण क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, सेवा क्षेत्र और बुनियादी ढाँचे में निवेश के कारण रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन पारंपरिक आँकड़ों से इनका पूरा आकलन करना कठिन है।


निष्कर्ष

रोजगार का मुद्दा शायद मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल का सबसे संवेदनशील और सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला विषय रहा है।

आलोचकों का कहना है कि सरकार तेज़ आर्थिक विकास के बावजूद पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध नहीं करा सकी। हालांकि  भारत जैसे विशाल और युवा देश में रोजगार की चुनौती किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। फिर भी, यह प्रश्न आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है कि क्या रोजगार सृजन देश की बढ़ती युवा आबादी की अपेक्षाओं के अनुरूप हो पाया है।


4. कृषि कानून और किसान आंदोलन – मोदी सरकार को तीनों कानून वापस क्यों लेने पड़े?

साल 2020 में केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में बड़े सुधारों के उद्देश्य से तीन नए कृषि कानून लागू किए। सरकार का कहना था कि इन कानूनों से किसानों को अपनी फसल बेचने की अधिक स्वतंत्रता मिलेगी, निजी निवेश बढ़ेगा, आधुनिक कृषि व्यवस्था विकसित होगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

लेकिन इन कानूनों का देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने तीखा विरोध किया। देखते ही देखते यह आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे और सबसे बड़े किसान आंदोलनों में बदल गया।

करीब एक वर्ष तक चले आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर धरने, कई दौर की बातचीत और देशव्यापी राजनीतिक बहस के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।

आलोचकों का कहना है कि यह सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और नीतिगत विफलताओं में से एक थी। वहीं सरकार का कहना है कि कानून किसानों के हित में थे, लेकिन जब बड़ी संख्या में किसान उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए, आखिरकार जनता के नाराजगी और असंतोष को देखते हुए उन्हें वापस ले लिया गया।


तीनों कृषि कानून क्या थे?

1. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020

इस कानून का उद्देश्य किसानों को APMC मंडियों के बाहर भी अपनी फसल बेचने की अनुमति देना था।

सरकार का दावा था कि इससे किसानों को अधिक खरीदार मिलेंगे और बेहतर कीमत प्राप्त होगी।


2. किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020

यह कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) से संबंधित था।

सरकार का कहना था कि इससे किसान पहले से तय कीमत पर कंपनियों के साथ समझौता कर सकेंगे, जिससे उनकी आय अधिक स्थिर होगी।


3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020

इस कानून के तहत अनाज, दाल, आलू, प्याज जैसी कई वस्तुओं पर सरकारी नियंत्रण में ढील दी गई।

सरकार का तर्क था कि इससे निजी निवेश, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं का विकास होगा।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. किसानों से पर्याप्त चर्चा नहीं हुई

किसान संगठनों और विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इतने बड़े कृषि सुधार लागू करने से पहले किसानों के संगठनों, राज्य सरकारों और कृषि विशेषज्ञों के साथ पर्याप्त संवाद नहीं किया।

उनका कहना था कि यदि पहले व्यापक चर्चा होती, तो इतना बड़ा आंदोलन शायद नहीं होता।


2. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर भरोसे की कमी

हालाँकि तीनों कानूनों में MSP समाप्त करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, लेकिन कई किसानों को आशंका थी कि धीरे-धीरे सरकारी खरीद कम हो जाएगी और मंडी व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी।

आलोचकों का कहना था कि यदि भविष्य में सरकारी खरीद कम हुई तो किसानों की सौदेबाजी की शक्ति घट सकती है।

सरकार लगातार कहती रही कि MSP व्यवस्था जारी रहेगी और सरकारी खरीद बंद नहीं होगी।

हालाँकि विरोध कर रहे किसान MSP को कानूनी गारंटी देने की मांग करते रहे। लेकिन सरकार ने गारंटी देना स्वीकार नहीं किया |


3. बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव की आशंका

कई किसान संगठनों का आरोप था कि नए कानूनों से बड़ी कृषि कंपनियों और कॉर्पोरेट घरानों को अधिक लाभ मिलेगा।

उनका तर्क था कि छोटे किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं और बड़ी कंपनियों के सामने उनकी सौदेबाजी की क्षमता सीमित हो सकती है।


4. दिल्ली सीमाओं पर लंबा आंदोलन

पंजाब और हरियाणा के हजारों किसान दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करना चाहते थे लेकिन केंद्र सरकार के आदेश पर पुलिस ने उन्हें दिल्ली में घुसने नहीं दिया|

नवंबर 2020 से हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं—सिंघू, टिकरी और गाज़ीपुर—पर बैठ गए।

यह आंदोलन लगभग एक वर्ष तक चला और इस दौरान कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।

आलोचकों का कहना है कि यदि सरकार शुरुआत में संवाद पर अधिक ध्यान देती, तो टकराव इतना लंबा नहीं चलता।


5. आंदोलन के दौरान मानवीय और सामाजिक मुद्दे

लंबे आंदोलन के दौरान कई किसानों की मृत्यु की खबरें सामने आईं। विभिन्न किसान संगठनों ने मौसम, दुर्घटनाओं, बीमारी और अन्य कारणों से करीब 700 किसानों की मौत का दावा किया।

आलोचकों ने कहा कि आंदोलन का लंबा खिंचना सामाजिक और मानवीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय था।


6. लोकतांत्रिक विरोध और पुलिस कार्रवाई पर सवाल

आंदोलन के दौरान बैरिकेडिंग, इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी प्रतिबंध, पुलिस कार्रवाई और 26 जनवरी 2021 की ट्रैक्टर रैली के बाद हुई हिंसा को लेकर भी व्यापक बहस हुई।

आलोचकों का आरोप था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों के साथ कुछ मामलों में अत्यधिक सख्ती की गई। उन पर लाठी चार्ज किया गया|


7. कानून वापस लेना सरकार की राजनीतिक हार माना गया

19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।

आलोचकों ने इसे सरकार की एक बड़ी राजनीतिक विफलता बताया।

उनका कहना था कि यदि कानून वास्तव में इतने लाभकारी थे, तो सरकार उन्हें लागू कराने में जनता का विश्वास क्यों नहीं जीत सकी।


निष्कर्ष

कृषि कानून और किसान आंदोलन मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक रहे।

आलोचकों का कहना है कि सरकार किसानों का विश्वास जीतने में असफल रही और संवाद की कमी के कारण एक बड़ा टकराव पैदा हुआ।कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि भारतीय कृषि क्षेत्र में सुधार आवश्यक थे, लेकिन इतने बड़े बदलाव के लिए अधिक व्यापक परामर्श, चरणबद्ध क्रियान्वयन और किसानों के विश्वास का निर्माण जरूरी था।

यह प्रकरण केवल तीन कानूनों का विवाद नहीं था, बल्कि इसने यह भी दिखाया कि भारत जैसे लोकतंत्र में बड़े आर्थिक सुधारों के लिए नीति के साथ-साथ संवाद, विश्वास और सहमति भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।


5. अनुच्छेद 370 हटाना – ऐतिहासिक फैसला या संघीय ढांचे पर सवाल?

5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया। इसके साथ ही अनुच्छेद 35A भी समाप्त हो गया और जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म कर दिया गया। राज्य का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया।

यह निर्णय मोदी सरकार के सबसे बड़े और सबसे चर्चित फैसलों में से एक था। सरकार और उसके समर्थकों ने इसे “ऐतिहासिक” और “राष्ट्रीय एकीकरण” की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। वहीं विपक्ष, कई संवैधानिक विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इसके तरीके और प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए।


अनुच्छेद 370 क्या था?

1949 में लागू अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों की तुलना में विशेष संवैधानिक दर्जा देता था।

इसके तहत—

  • जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान था।
  • राज्य का अलग झंडा था।
  • संसद के कई कानून स्वतः लागू नहीं होते थे।
  • भूमि और स्थायी निवास से जुड़े विशेष अधिकार मौजूद थे।

सरकार का कहना था कि यह व्यवस्था अस्थायी थी और अब इसे समाप्त करने का समय आ गया था।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. राज्य की सहमति के बिना निर्णय लेने का आरोप

सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, तब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू था और वहाँ निर्वाचित विधानसभा मौजूद नहीं थी।

आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहमति आवश्यक थी।


2. राज्य का दर्जा घटाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाना

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी पूर्ण राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदला गया।

आलोचकों का कहना है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता और भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) पर प्रश्न खड़े हुए।


3. संचार प्रतिबंध और इंटरनेट बंदी

फैसले के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर में मोबाइल सेवाएँ, इंटरनेट और कई संचार माध्यमों पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए।

कई महीनों तक इंटरनेट सेवाएँ सीमित रहीं।

आलोचकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा, व्यापार और पत्रकारिता पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाला कदम बताया।


4. राजनीतिक नेताओं की नजरबंदी

फैसले के बाद कई प्रमुख कश्मीरी राजनीतिक नेताओं को एहतियातन हिरासत में लिया गया।

पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सहित कई नेताओं को कुछ समय तक नजरबंद रखा गया।

आलोचकों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के विरुद्ध बताया।


5. मानवाधिकार संगठनों की चिंताएँ

कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञों ने इंटरनेट प्रतिबंध, हिरासत और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर चिंता व्यक्त की।

आलोचकों का कहना था कि सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जाना चाहिए था।


6. स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव

अनुच्छेद 370 हटने के बाद लंबे समय तक विधानसभा चुनाव नहीं हुए।

आलोचकों ने कहा कि इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हुआ।


निष्कर्ष

अनुच्छेद 370 हटाना मोदी सरकार के सबसे ऐतिहासिक और सबसे विवादित फैसलों में से एक माना जाता है।

समर्थकों के लिए यह भारत के पूर्ण एकीकरण और समान संवैधानिक व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम है। आलोचकों के लिए यह संवैधानिक प्रक्रिया, संघीय ढांचे और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाने वाला निर्णय है। इसे लागू करने से पहले विपक्षी दलों की सहमति लेना अनिवार्य था |

यही कारण है कि यह मुद्दा आज भी भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में शामिल है।


 

6. नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और NRC विवाद – राष्ट्रीय सुरक्षा का कदम या समानता के सिद्धांत पर बहस?

दिसंबर 2019 में संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act – CAA) पारित किया। सरकार ने इसे पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को राहत देने वाला मानवीय कानून बताया।

लेकिन कानून पारित होने के बाद देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। दिल्ली, असम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कई अन्य राज्यों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। शाहीन बाग़ का धरना इस आंदोलन का सबसे चर्चित प्रतीक बना।

CAA के साथ-साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर भी व्यापक बहस शुरू हुई। विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई कि यदि CAA और NRC को साथ लागू किया गया तो इससे कुछ समुदायों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

इसलिए यह विवाद मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहसों में से एक बन गया।


CAA क्या है?

CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के उन लोगों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया आसान की गई, जो वहाँ धार्मिक उत्पीड़न का दावा करते हैं।

इस कानून में मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि सरकार का तर्क था कि ये तीनों देश इस्लामिक राष्ट्र हैं और वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण की आवश्यकता है।


NRC क्या है?

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens – NRC) का उद्देश्य देश के वैध नागरिकों का रिकॉर्ड तैयार करना है।

अब तक पूरे देश में NRC लागू नहीं हुआ है। असम में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में अलग प्रक्रिया के तहत NRC तैयार किया गया था।

हालाँकि विपक्ष और कई नागरिक संगठनों ने आशंका जताई कि भविष्य में यदि राष्ट्रीय स्तर पर NRC लागू हुआ तो लोगों को नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. धर्म के आधार पर नागरिकता देने का आरोप

सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि CAA पहली बार नागरिकता के प्रश्न में धर्म को आधार बनाता हुआ दिखाई देता है।

आलोचकों का कहना है कि भारतीय संविधान समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है, इसलिए किसी एक धर्म को शामिल करना और दूसरे को बाहर रखना संविधान की भावना के विपरीत माना जा सकता है।


2. मुस्लिम समुदाय में आशंका

कई मुस्लिम संगठनों और नागरिक समूहों ने चिंता व्यक्त की कि यदि भविष्य में CAA और NRC साथ लागू किए गए, तो नागरिकता संबंधी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

हालांकि सरकार ने बार-बार कहा कि भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता CAA के कारण नहीं जाएगी और भारतीय मुसलमानों को इस कानून से डरने की आवश्यकता नहीं है।


3. देशव्यापी विरोध प्रदर्शन

CAA के विरोध में देशभर में लंबे समय तक प्रदर्शन हुए।

दिल्ली का शाहीन बाग़ आंदोलन शांतिपूर्ण धरनों का प्रमुख केंद्र बना, जबकि कई अन्य स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक भी हो गए।

आलोचकों का कहना है कि यह व्यापक विरोध इस बात का संकेत था कि सरकार जनता की आशंकाओं को दूर करने में सफल नहीं रही।


4. पुलिस कार्रवाई पर सवाल

कुछ विश्वविद्यालय परिसरों और विरोध स्थलों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर भी विवाद हुआ।

कई मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। पुलिस प्रदर्शनकारियों से काफी क्रूरता से पेश आई|


5. असम और पूर्वोत्तर की अलग चिंताएँ

दिलचस्प बात यह थी कि असम और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में CAA का विरोध धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय पहचान और जनसंख्या संतुलन को लेकर था।

कई संगठनों का कहना था कि किसी भी बाहरी व्यक्ति को नागरिकता देने से स्थानीय संस्कृति, भाषा और संसाधनों पर प्रभाव पड़ सकता है।


6. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

CAA को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, विदेशी मीडिया संस्थानों और कुछ देशों के सांसदों ने चिंता व्यक्त की।

आलोचकों ने इसे भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि से जोड़कर देखा।


सरकार किन उपलब्धियों का दावा करती है?

सरकार के अनुसार CAA का उद्देश्य किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता छीनना नहीं, बल्कि धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों को मानवीय आधार पर नागरिकता देना है।

सरकार का दावा है—

  • पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में दशकों से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को राहत मिली।
  • नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल हुई।
  • यह कानून केवल विशेष परिस्थितियों वाले सीमित समूह पर लागू होता है।
  • भारतीय नागरिकों के अधिकारों पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

निष्कर्ष

CAA और NRC का विवाद केवल एक कानून तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने संविधान, नागरिकता, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया। सरकार के अनुसार CAA का उद्देश्य किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता छीनना नहीं, बल्कि धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों को मानवीय आधार पर नागरिकता देना है।

लेकिन . . . 

आलोचकों का मानना है कि सरकार नागरिकों की आशंकाओं को दूर करने और व्यापक संवाद स्थापित करने में सफल नहीं रही।

इसलिए  CAA और NRC कानून भी मोदी सरकार के सबसे अधिक चर्चित और विवादित मुद्दों में गिने जाते हैं।


7. मणिपुर हिंसा – कानून-व्यवस्था की विफलता या दशकों पुराने जातीय संघर्ष का विस्फोट?

साल 2023 में पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह स्वतंत्र भारत की सबसे गंभीर आंतरिक हिंसक घटनाओं में से एक मानी गई। महीनों तक चली हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई, हजारों लोग घायल हुए, कई धार्मिक स्थल और घर नष्ट हुए तथा हजारों परिवारों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी।

हिंसा मुख्य रूप से मैतेई (Meitei) और कुकी-जो (Kuki-Zo) समुदायों के बीच हुई, लेकिन इसके सामाजिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रभाव पूरे देश में महसूस किए गए।

विपक्ष और सरकार के आलोचकों ने इस मामले को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलताओं में से एक बताया।


मणिपुर हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?

3 मई 2023 को अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग से जुड़े एक “Tribal Solidarity March” के बाद कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी।

धीरे-धीरे यह हिंसा बड़े पैमाने पर जातीय संघर्ष में बदल गई। कई जिलों में आगजनी, गोलीबारी और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ सामने आईं।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सेना, असम राइफल्स और अन्य केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. हिंसा लंबे समय तक नियंत्रित नहीं हो सकी

आलोचकों का सबसे बड़ा आरोप था कि शुरुआती दिनों में प्रशासन हिंसा पर तेजी से नियंत्रण नहीं कर पाया।

उनका कहना था कि यदि प्रारंभिक चरण में अधिक प्रभावी कार्रवाई होती, तो हिंसा इतनी व्यापक नहीं होती।


2. प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया में देरी का आरोप

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इतनी बड़ी हिंसा के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साधे रखी और विपक्ष के हंगामे के बाद सार्वजनिक रूप से काफी देर बाद विस्तृत प्रतिक्रिया दी। आलोचकों का कहना था कि देश के सर्वोच्च निर्वाचित नेता को पहले ही स्थिति पर विस्तार से बोलना चाहिए था।


3. महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ

हिंसा के दौरान महिलाओं के साथ अत्यंत गंभीर अपराधों की खबरें सामने आईं।

विशेष रूप से महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने से जुड़ा एक वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया।

आलोचकों ने कहा कि यह कानून-व्यवस्था की गंभीर विफलता थी।


4. राहत शिविरों में विस्थापित लोग

हिंसा के कारण हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े।

राहत शिविरों में लंबे समय तक रहने वाले परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामान्य जीवन से जुड़ी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

आलोचकों का ये भी कहना है कि पुनर्वास की प्रक्रिया अपेक्षा से धीमी रही।


5. इंटरनेट बंदी पर विवाद

हिंसा के दौरान लंबे समय तक इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया।

सरकार का कहना था कि अफवाहों और हिंसा को फैलने से रोकने के लिए यह कदम आवश्यक था।

आलोचकों का कहना था कि लंबे इंटरनेट प्रतिबंध से छात्रों, व्यवसायों, पत्रकारों और आम नागरिकों को भारी कठिनाई हुई तथा सूचना तक पहुँच प्रभावित हुई।


6. सुरक्षा बलों की भूमिका पर सवाल

कुछ आलोचकों ने आरोप लगाया कि शुरुआती चरण में सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं थी और हथियारों की लूट जैसी घटनाएँ हुईं।

सरकार का कहना है कि अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, फ्लैग मार्च, हथियारों की बरामदगी और लगातार अभियान चलाकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया।


7. राज्य सरकार की भूमिका पर विपक्ष के सवाल

विपक्षी दलों ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि प्रशासन सभी समुदायों का विश्वास बनाए रखने में सफल नहीं रहा।

कुछ विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की भी मांग की।


निष्कर्ष

मणिपुर हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं थी, बल्कि जातीय पहचान, भूमि अधिकार, सामाजिक अविश्वास और सुरक्षा जैसे कई जटिल कारणों से जुड़ा संकट थी।

आलोचकों का कहना है कि सरकार हिंसा को समय रहते नियंत्रित करने और राजनीतिक स्तर पर भरोसा कायम करने में अपेक्षित सफलता नहीं हासिल कर सकी। वहीं सरकार का तर्क है कि उसने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में सुरक्षा, राहत और शांति बहाली के लिए हरसंभव प्रयास किए।


8. चुनावी बॉन्ड योजना – पारदर्शी राजनीतिक फंडिंग या गोपनीय चंदे का विवाद?

राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लंबे समय से भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में मोदी सरकार ने 2017 के केंद्रीय बजट में चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) योजना की घोषणा की और 2018 से इसे लागू किया।

सरकार का कहना था कि इस योजना का उद्देश्य राजनीतिक चंदे को बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से लाना, नकद लेन-देन कम करना और चुनावी फंडिंग को अधिक पारदर्शी बनाना था।

लेकिन समय के साथ यह योजना देश की सबसे विवादित नीतियों में से एक बन गई। विपक्ष, चुनाव सुधार से जुड़े संगठनों, कई पूर्व चुनाव आयुक्तों, नागरिक समाज के समूहों और पारदर्शिता के समर्थकों ने इस योजना की आलोचना की। अंततः फरवरी 2024 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

आलोचकों ने इसे मोदी सरकार की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक भूलों में से एक बताया, जबकि सरकार का तर्क था कि योजना का उद्देश्य नकद और काले धन पर आधारित राजनीतिक फंडिंग को कम करना था।


चुनावी बॉन्ड क्या थे?

चुनावी बॉन्ड एक वित्तीय साधन (Financial Instrument) थे जिन्हें भारतीय नागरिक और भारत में पंजीकृत कंपनियाँ भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से पैसे दे कर खरीद सकती थीं। इन बॉन्ड को निर्धारित समय सीमा के भीतर कोई पात्र राजनीतिक दल बैंक में जमा कराकर राशि प्राप्त कर सकता था।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि सार्वजनिक रूप से यह जानकारी उपलब्ध नहीं होती थी कि किस व्यक्ति या कंपनी ने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया।

यही गोपनीयता इस योजना का सबसे बड़ा विवाद बनी।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता कम होने का आरोप

सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि आम जनता यह नहीं जान सकती थी कि किस राजनीतिक दल को किस कंपनी या व्यक्ति ने कितना पैसा दिया।

आलोचकों का कहना था कि लोकतंत्र में मतदाताओं को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि राजनीतिक दलों को आर्थिक सहायता कौन दे रहा है।

उनका तर्क था कि गोपनीयता से हितों के टकराव (Conflict of Interest) और संभावित प्रभाव का आकलन करना कठिन हो जाता है।


2. सत्तारूढ़ दल को अधिक लाभ मिलने का आरोप

चुनावी बॉन्ड के आँकड़े सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि कुल चंदे का बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला।

आलोचकों का कहना था कि जब दानदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं होती, तब सत्ता में बैठी पार्टी को स्वाभाविक रूप से अधिक लाभ मिल सकता है।

और ऐसा हुआ भी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश जांच में यह बात सामने आई की सबसे ज्यादा चंदा , लगभग 6,060 करोड़ रुपये  भारतीय जनता पार्टी  (बीजेपी) को मिला था| जो चंदे की कुल राशि  12,700 करोड़ का लगभग आधा हिस्सा था |


3. कंपनियों के लिए नियमों में बदलाव

आलोचकों ने यह भी कहा कि कानून में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे कंपनियों के राजनीतिक चंदे पर पहले से मौजूद कुछ सीमाएँ हट गईं।

उनका तर्क था कि इससे नई या कम व्यावसायिक गतिविधि वाली कंपनियाँ भी बड़े पैमाने पर राजनीतिक चंदा दे सकती थीं।


4. मतदाताओं के “जानने के अधिकार” पर बहस

कई चुनाव सुधार विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों का कहना था कि लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं है, बल्कि मतदाताओं का यह अधिकार भी है कि वे जान सकें कि राजनीतिक दलों को आर्थिक सहायता कौन दे रहा है। इसी आधार पर कई याचिकाएँ सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गईं।


5. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि मतदाताओं का सूचना पाने का अधिकार लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है और राजनीतिक चंदे में अत्यधिक गोपनीयता उस अधिकार को प्रभावित करती है।

इसके बाद न्यायालय के निर्देश पर भारतीय स्टेट बैंक ने चुनावी बॉन्ड से संबंधित उपलब्ध जानकारी चुनाव आयोग को सौंपी, जिसे बाद में सार्वजनिक किया गया।

आलोचकों ने इसे अपनी दलीलों की पुष्टि बताया।


6. कॉर्पोरेट प्रभाव को लेकर चिंता

कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि यदि बड़े उद्योग समूह राजनीतिक दलों को बड़ी राशि दान देते हैं और यह जानकारी सार्वजनिक न हो, तो नीति-निर्माण पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठ सकते हैं।


निष्कर्ष

चुनावी बॉन्ड योजना भारतीय चुनावी वित्त व्यवस्था में सबसे बड़े संवैधानिक विवादों में बदल गई।

आलोचकों का मानना है कि राजनीतिक फंडिंग में गोपनीयता लोकतंत्र की पारदर्शिता के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। दूसरी ओर सरकार का तर्क था कि योजना का उद्देश्य नकद चंदे और काले धन को कम करके राजनीतिक वित्त व्यवस्था को औपचारिक बनाना था। लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि आखिर राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये के चंदे की जरूरत ही क्यों है। लगभग सारे राजनेता तो पहले से ही करोड़पति हैं। चुनावी बॉन्ड जैसी असंवैधानिक योजना लाने का मतलब है कि भारतीय राजनीति में आने के लिए और चुनाव जीतने के लिए आपके पास करोड़ों रुपये होना जरूरी है। गरीब और ईमानदार व्यक्ति के भारत की राजनीति में कोई जगह ही नहीं है । 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद यह बहस और गहरी हो गई कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की फंडिंग कितनी पारदर्शी होनी चाहिए और मतदाताओं को कितनी जानकारी मिलनी चाहिए।

इस कारण चुनावी बॉन्ड योजना मोदी सरकार के सबसे चर्चित और सबसे विवादित निर्णयों में से एक मानी जाती है।


9. पेगासस जासूसी विवाद – राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला या निजता और लोकतंत्र पर गंभीर सवाल?

साल 2021 में दुनिया भर के कई मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय खोजी रिपोर्ट के बाद पेगासस (Pegasus) स्पाइवेयर का मुद्दा भारत में बड़े राजनीतिक विवाद का कारण बना। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि दुनिया के कई देशों में पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, नौकरशाहों और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के मोबाइल नंबर संभावित निगरानी सूची में शामिल थे।

भारत में भी कई प्रमुख नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने के बाद विपक्ष ने मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।

यह विवाद निजता के अधिकार, लोकतांत्रिक संस्थाओं और डिजिटल निगरानी की सीमाओं को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।


पेगासस क्या है?

पेगासस इज़राइल की साइबर सुरक्षा कंपनी NSO Group द्वारा विकसित एक अत्यधिक उन्नत स्पाइवेयर है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी डिवाइस में यह सफलतापूर्वक स्थापित हो जाए, तो यह फोन के अनेक डेटा—जैसे संदेश, ईमेल, संपर्क, फोटो, लोकेशन और कुछ परिस्थितियों में कैमरा या माइक्रोफोन तक—तक पहुँच बनाने में सक्षम हो सकता है।

NSO Group का कहना रहा है कि उसका सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को आतंकवाद और गंभीर अपराधों से निपटने के उद्देश्य से बेचा जाता है।


विवाद कैसे शुरू हुआ?

2021 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के एक समूह ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की। उसमें दावा किया गया कि कई देशों में हजारों मोबाइल नंबर संभावित निगरानी सूची का हिस्सा थे।

भारत से भी कई पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, चुनाव रणनीतिकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ सरकारी अधिकारियों के नाम चर्चा में आए।

हालाँकि, किसी सूची में किसी नंबर का होना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि उस फोन में वास्तव में पेगासस स्थापित किया गया था। बाद में कुछ मामलों में डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण में संक्रमण (infection) के संकेत मिलने की रिपोर्टें भी सामने आईं, जबकि अन्य मामलों में ऐसा निष्कर्ष नहीं निकला।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. निजता के अधिकार पर सवाल

आलोचकों का कहना था कि यदि पत्रकारों, विपक्षी नेताओं या नागरिकों की अवैध निगरानी की गई हो, तो यह भारतीय संविधान द्वारा संरक्षित निजता के अधिकार (Right to Privacy) का गंभीर उल्लंघन होगा।

2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार माना था। इसी आधार पर विपक्ष ने इस मुद्दे को संवैधानिक प्रश्न बताया।


2. विपक्षी नेताओं की निगरानी के आरोप

विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यदि राजनीतिक विरोधियों की जासूसी हुई, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है।

उनका कहना था कि विपक्ष की गतिविधियों पर गैरकानूनी निगरानी लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है।


3. पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता

कई पत्रकार संगठनों ने चिंता जताई कि यदि पत्रकारों की निगरानी की जाती है, तो उनके स्रोत (Sources) की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।

आलोचकों का कहना था कि इससे स्वतंत्र पत्रकारिता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।


4. सर्वोच्च न्यायालय की समिति

इस मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक स्वतंत्र तकनीकी समिति गठित की।

न्यायालय ने कहा कि केवल “राष्ट्रीय सुरक्षा” का सामान्य उल्लेख करके हर मामले में न्यायिक समीक्षा से बचा नहीं जा सकता।

तकनीकी समिति ने कुछ उपकरणों की जांच की। सार्वजनिक रिपोर्ट में कुछ फोन में मैलवेयर के संकेत मिले, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं किया गया कि वे पेगासस ही थे या उसके लिए कौन जिम्मेदार था।


5. सरकार की प्रतिक्रिया पर विपक्ष की आलोचना

विपक्ष का कहना था कि सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए था कि क्या भारत सरकार ने पेगासस खरीदा या उसका उपयोग किया।

सरकार ने इस पर प्रत्यक्ष “हाँ” या “नहीं” में उत्तर नहीं दिया और कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

आलोचकों ने इसी रुख को विवाद का एक बड़ा कारण बताया।


6. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस

पेगासस विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं था।

दुनिया के कई देशों में भी इस स्पाइवेयर के उपयोग को लेकर जांच, संसदीय बहस और न्यायिक प्रक्रियाएँ शुरू हुईं।

इससे डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और मानवाधिकारों पर वैश्विक स्तर पर चर्चा तेज हुई।



निष्कर्ष

पेगासस विवाद ने भारत में डिजिटल युग के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने रखा—राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की निजता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

आलोचकों का मानना है कि सरकार पर्याप्त पारदर्शिता नहीं दिखा सकी और इससे जनता के मन में संदेह पैदा हुआ। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर हर जानकारी सार्वजनिक करना संभव नहीं होता और सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

यह विवाद आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाता, क्योंकि इसके कई पहलुओं पर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस जारी है। इसी कारण पेगासस मामला मोदी सरकार के सबसे चर्चित विवादों में शामिल किया जाता है।


10. संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर उठे सवाल – लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हुईं या पहले से अधिक जवाबदेह बनीं?

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती केवल सरकार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उन स्वतंत्र संस्थाओं पर भी निर्भर करती है जो सरकार की शक्तियों पर संतुलन (Checks and Balances) बनाए रखती हैं। इनमें चुनाव आयोग (Election Commission), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED), आयकर विभाग, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), संसद, सूचना आयोग, विश्वविद्यालय, मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाएँ शामिल हैं।

पिछले एक दशक में विपक्ष, कई पूर्व नौकरशाहों, संवैधानिक विशेषज्ञों, पत्रकारों और कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

यह मुद्दा मोदी सरकार की सबसे व्यापक और लगातार होने वाली आलोचनाओं में से एक रहा है।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. प्रवर्तन निदेशालय (ED) और CBI के बढ़ते उपयोग पर सवाल

विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह रहा कि ED और CBI जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया गया।

कई विपक्षी नेताओं के घरों और कार्यालयों पर छापे पड़े, पूछताछ हुई और कुछ नेताओं को गिरफ्तार भी किया गया। इसी कड़ी में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, मनीष सीसोदिया और आम आदमी पार्टी के 23 और लोगों को झूठे केस में फंसा कर जेल में डाल दिया गया | महीनों तक जेल में रहने के बाद 27  फरवरी  कोर्ट ने सारे आरोप खारिज कर दिए और जितने भी अभियुक्त थे सबको आरोपमुक्त कर दिया |

अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए सीबीआई की जांच में खामियों पर कड़ी टिप्पणी भी की है |अदालत ने जांच में हुई खामियों के लिए सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि चार्जशीट में कई खामियां हैं जिनका समर्थन किसी गवाह या बयान से नहीं होता |

आलोचकों का कहना है कि कई मामलों में कार्रवाई विपक्षी नेताओं पर अधिक केंद्रित दिखाई दी, जिससे एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठे।


2. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बहस

कुछ विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार के दौरान सत्तारूढ़ दल के खिलाफ शिकायतों पर अपेक्षित कठोरता नहीं दिखाई।

आलोचकों ने आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के पालन और चुनावी भाषणों से जुड़े मामलों में आयोग की भूमिका पर प्रश्न उठाए। SIR को लेकर चुनाव आयोग के अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार की भी काफी आलोचना हुई।  

2025 में  बिहार विधानसभा चुनाव और  2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगे |


3. राज्यपालों की भूमिका पर विवाद

कई विपक्ष-शासित राज्यों—जैसे तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब और अन्य—में राज्यपाल और निर्वाचित राज्य सरकारों के बीच टकराव देखने को मिला।

आलोचकों का कहना है कि कुछ मामलों में राज्यपालों ने विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखा या निर्वाचित सरकारों के साथ टकराव की स्थिति पैदा की।


4. संसद में विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया

विपक्ष ने आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं कराई गई और उन्हें जल्दबाज़ी में पारित किया गया।

कुछ मामलों में विपक्षी सांसदों के निलंबन और सीमित बहस को लेकर भी आलोचना हुई।


5. सूचना के अधिकार (RTI) और पारदर्शिता

कुछ पारदर्शिता समर्थक संगठनों ने सूचना के अधिकार कानून में किए गए कुछ संशोधनों और सूचना आयोगों में रिक्त पदों को लेकर चिंता व्यक्त की।

आलोचकों का कहना है कि इससे सरकारी जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।

सरकार का कहना है कि RTI व्यवस्था जारी है और सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पहले की तरह लागू है।


6. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्वायत्तता पर बहस

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में RBI और केंद्र सरकार के बीच कुछ आर्थिक नीतियों को लेकर मतभेद सार्वजनिक चर्चा का विषय बने।

विशेष रूप से तत्कालीन RBI गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।

सरकार ने कहा कि सरकार और RBI के बीच नीति संबंधी मतभेद किसी भी लोकतंत्र में सामान्य बात हैं और दोनों संस्थाएँ अपने-अपने संवैधानिक दायरे में काम करती हैं।


7. मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल

कुछ पत्रकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े संगठनों ने आरोप लगाया कि भारत में मीडिया पर आर्थिक, कानूनी या राजनीतिक दबाव बढ़ा है।

आलोचकों का कहना है कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार की आलोचना करने से बचते हैं और मीडिया का एक हिस्सा सरकार के प्रति अत्यधिक अनुकूल रुख अपनाता है। भारत के सबसे ईमानदार पत्रकारों में से एक रविश कुमार नें तो भारत के मीडिया संस्थानों को गोदी मीडिया का नाम दे रखा है | जो मोदी सरकार की गोद में पलती है और हमेशा मोदी सरकार का महिममंडन करती रहती है |


8. न्यायपालिका को लेकर बहस

कुछ मामलों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, लंबित मामलों और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर भी सार्वजनिक बहस हुई।

हालाँकि भारत की न्यायपालिका एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और अनेक मामलों में उसने सरकार के खिलाफ भी फैसले दिए हैं। लेकिन कई मामलों मे न्यायपालिका का झुकाव सरकार की तरफ ही दिखा और कुछ न्यायाधीशों के फैसले पर सवाल भी उठे।  

इसी कारण कई विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई भी निष्कर्ष अत्यंत सावधानी से निकालना चाहिए 


निष्कर्ष

संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का प्रश्न किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती से जुड़ा विषय है।

आलोचकों का मानना है कि पिछले एक दशक में कई संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता को लेकर जनता के बीच संदेह बढ़ा है। वहीं सरकार का तर्क है कि कानून का सख्त पालन और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक रंग देकर संस्थाओं की छवि खराब करने की कोशिश की जाती है।

इस विषय पर अंतिम राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि लोकतंत्र में स्वतंत्र संस्थाओं पर जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। इसलिए इस मुद्दे पर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।


11. विदेश यात्राएँ और विदेश नीति – वैश्विक नेतृत्व की सफलता या घरेलू प्राथमिकताओं पर उठे सवाल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद विदेश नीति को अपनी सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया। पिछले एक दशक में उन्होंने दुनिया के अनेक देशों की यात्राएँ कीं, कई वैश्विक सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करने का प्रयास किया।

सरकार का दावा है कि इन यात्राओं से भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी, विदेशी निवेश आकर्षित हुआ, रणनीतिक साझेदारियाँ मजबूत हुईं और भारत की कूटनीतिक स्थिति पहले से अधिक प्रभावशाली बनी।

लेकिन विपक्ष और आलोचकों ने इन विदेश दौरों को लेकर कई सवाल उठाए। उनका कहना है कि यात्राओं की संख्या, सरकारी खर्च, उनके प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ और कुछ अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के संदर्भ में सरकार से जवाबदेही अपेक्षित थी।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. विदेश यात्राओं की संख्या पर सवाल

विपक्ष ने कई बार आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में बड़ी संख्या में विदेश यात्राएँ कीं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में अभी तक रिकार्ड  103 विदेश यात्राए की है |

आलोचकों का कहना था कि जब देश में बेरोज़गारी, महंगाई और कृषि जैसी घरेलू समस्याएँ थीं, तब प्रधानमंत्री को इन मुद्दों पर अधिक समय देना चाहिए था।

सरकार का जवाब था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी भी बड़े देश के प्रधानमंत्री के लिए सक्रिय विदेश नीति आवश्यक होती है और ये यात्राएँ भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए थीं।


2. सरकारी खर्च को लेकर विवाद

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर भी विपक्ष ने प्रश्न उठाए।

आलोचकों का तर्क था कि इन यात्राओं पर सुरक्षा, विशेष विमान, प्रतिनिधिमंडल और अन्य व्यवस्थाओं पर बड़ी राशि खर्च होती है।

मोदी की विदेश यात्राओं पर खर्च 2014-2026 तक करीब 890 करोड़ रुपए खर्च हुए |

लेकिन उससे दर्श को मिला क्या?

वही सरकार का कहना है कि किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सुरक्षा और आधिकारिक प्रोटोकॉल के कारण ऐसे खर्च सामान्य होते हैं और इन्हें केवल व्यय के रूप में नहीं बल्कि रणनीतिक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।


3. आर्थिक लाभ पर बहस

सरकार का दावा है कि विदेश यात्राओं के दौरान कई निवेश समझौते, व्यापारिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारियाँ हुईं।

आलोचकों का कहना है कि घोषित निवेश और वास्तविक निवेश में अंतर हो सकता है, इसलिए यात्राओं की सफलता का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि वास्तविक परिणामों से होना चाहिए।


4. पड़ोसी देशों के साथ संबंध

आलोचकों ने कहा कि नेपाल, मालदीव, चीन, कनाडा और कुछ अन्य देशों के साथ समय-समय पर संबंधों में तनाव देखने को मिला।

उनका तर्क है कि सक्रिय विदेश नीति के बावजूद भारत को कुछ कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध हमेशा बदलते रहते हैं और मतभेद किसी भी देश के साथ हो सकते हैं। साथ ही उसने अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूएई और कई अन्य देशों के साथ संबंधों के मजबूत होने को अपनी उपलब्धि बताया।


5. विदेश में बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम

प्रधानमंत्री मोदी ने कई देशों में भारतीय प्रवासी समुदाय को संबोधित किया।

आलोचकों का कहना था कि इन कार्यक्रमों को अत्यधिक प्रचारित किया गया और इन्हें घरेलू राजनीतिक छवि से भी जोड़ा गया।

सरकार का तर्क है कि भारतीय प्रवासी समुदाय भारत की “सॉफ्ट पावर” का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उनसे संवाद करना किसी भी प्रधानमंत्री की सामान्य कूटनीतिक भूमिका का हिस्सा है।


निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति उनके कार्यकाल की विवादित नीति रही है।

आलोचकों का मानना है कि विदेश यात्राओं के वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक लाभों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। इसलिए आलोचक इसके कुछ पहलुओं पर लगातार प्रश्न उठाते रहे हैं। और सरकार की तरफ से इन प्रश्नों का कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है। 


12. महिला पहलवानों का आंदोलन – खिलाड़ियों को न्याय नहीं मिला या सरकार ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया?

साल 2023 में भारत के कुछ सबसे प्रसिद्ध पहलवानों—जिनमें ओलंपिक और विश्व स्तर पर पदक जीत चुके खिलाड़ी भी शामिल थे—ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देकर भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के तत्कालीन अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपों की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की।

इस आंदोलन ने केवल खेल जगत ही नहीं, बल्कि पूरे देश में महिला सुरक्षा, खेल संस्थाओं की जवाबदेही और सरकार की भूमिका पर व्यापक बहस छेड़ दी।

आलोचकों का कहना है कि सरकार ने देश के शीर्ष खिलाड़ियों की शिकायतों पर समय रहते पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि उसने शिकायतों की जांच के लिए समिति बनाई, न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया और मामला कानून के अनुसार आगे बढ़ा।


विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

जनवरी 2023 में कई अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवानों ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने वर्षों तक महिला खिलाड़ियों का यौन उत्पीड़न किया।

मुख्य मांगें थीं—

  • बृजभूषण शरण सिंह को पद से हटाया जाए।
  • उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो।
  • निष्पक्ष जांच हो।
  • महिला खिलाड़ियों को सुरक्षित वातावरण मिले।

सरकार ने शुरुआती विरोध के बाद एक निरीक्षण (Oversight) समिति गठित की, जिसके कारण पहला धरना समाप्त हुआ। लेकिन बाद में खिलाड़ियों ने आरोप लगाया कि समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई और पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद अप्रैल 2023 में आंदोलन दोबारा शुरू हुआ।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. एफआईआर दर्ज करने में देरी

आलोचकों का सबसे बड़ा आरोप था कि महिला खिलाड़ियों की शिकायत के बावजूद दिल्ली पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज नहीं की।

हालांकि दबाव बढ़ने पर दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ वयस्क महिला पहलवानों की शिकायतों से संबंधित मामले में आरोपपत्र दायर किया। उन्होंने आरोपों से इनकार किया। बाद में दिल्ली की एक अदालत ने उनके विरुद्ध कुछ आरोपों पर विचारण (trial) आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

वहीं, नाबालिग शिकायतकर्ता से जुड़े POCSO मामले में पुलिस ने समापन रिपोर्ट (closure report) दाखिल की, जिसे बाद में अदालत ने स्वीकार कर लिया। हालांकि इसके बाद भी मामला लंबित रहा और बाद में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद एफआईआर दर्ज की गई। इसी कारण विपक्ष ने कहा कि खिलाड़ियों को न्याय पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।


2. खिलाड़ियों को लंबे समय तक धरना देना पड़ा

ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके खिलाड़ी कई सप्ताह तक जंतर-मंतर पर बैठे रहे।

आलोचकों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को अपनी बात सुनाने के लिए सड़क पर बैठना पड़ा, जो खेल प्रशासन की गंभीर विफलता थी।


3. पुलिस कार्रवाई पर विवाद

28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दिन जब पहलवान संसद की ओर मार्च कर रहे थे, तब दिल्ली पुलिस ने उन्हें रोक दिया और कई खिलाड़ियों को हिरासत में लिया। पुलिस द्वारा उन्हें पीटा गया | उन्हें हटाने के क्रम में रोड पर घसीटा गया |

इस घटना की तस्वीरें और वीडियो पूरे देश में चर्चा का विषय बने।

आलोचकों ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ियों के साथ कठोर व्यवहार किया गया।


4. सरकार की चुप्पी पर सवाल

विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने इस पूरे विवाद पर काफी समय तक स्पष्ट राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

आलोचकों का कहना था कि यदि आरोप किसी सामान्य खेल अधिकारी पर होते तो कार्रवाई अधिक तेज होती।


5. खेल संस्थाओं में जवाबदेही का मुद्दा

इस आंदोलन ने केवल एक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि खेल महासंघों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए।

कई खिलाड़ियों और खेल विशेषज्ञों ने कहा कि खिलाड़ियों के लिए शिकायत दर्ज कराने की स्वतंत्र और सुरक्षित व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।


6. अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रभाव

आलोचकों का कहना था कि जब विश्व स्तरीय महिला खिलाड़ी सड़क पर बैठकर न्याय की मांग करें, तो इससे भारत की खेल व्यवस्था और महिला सुरक्षा की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित होती है।

सरकार का कहना था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ विरोध प्रदर्शन की अनुमति है और न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से काम कर रही थी।


निष्कर्ष

अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह को सुबूतों के अभाव  में बरी कर दिया है लेकिन इसने भारत में महिला सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और सरकार की भूमिका पर व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है ।

आलोचकों का मानना है कि सरकार की पूरी तंत्र नें बृजभूषण शरण सिंह को बचाने का काम किया है|

यही कारण है कि महिला पहलवानों का आंदोलन मोदी सरकार के कार्यकाल के सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विवादों में गिना जाता है।

13. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) विवाद – मतदाता सूची शुद्धिकरण की ज़रूरत या मताधिकार पर उठे सवाल?

हाल के वर्षों में निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, अपात्र नाम हटाना और पात्र नागरिकों के नाम सुनिश्चित करना बताया गया। चुनाव आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है।

लेकिन विपक्षी दलों, कुछ नागरिक संगठनों और चुनाव सुधार से जुड़े विशेषज्ञों ने इस प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए। उनका कहना था कि यदि यह प्रक्रिया पर्याप्त सावधानी और पारदर्शिता के बिना लागू की जाए, तो वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से हट सकते हैं और लोगों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है।


SIR क्या है?

Special Intensive Revision (SIR) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चुनाव आयोग मतदाता सूची का विस्तृत सत्यापन करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि—

  • केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची में हों।
  • मृत, स्थानांतरित या अपात्र व्यक्तियों के नाम हटाए जाएँ।
  • नई पात्र आबादी को सूची में जोड़ा जाए।
  • मतदाता सूची अधिक सटीक और विश्वसनीय बने।

आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने की आशंका

विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना था कि यदि दस्तावेज़ों के सत्यापन में त्रुटियाँ हों या प्रक्रिया बहुत जटिल हो, तो गरीब, प्रवासी मजदूर, बुजुर्ग और दूर-दराज़ क्षेत्रों के लोगों के नाम भी मतदाता सूची से हट सकते हैं।

उनका तर्क था कि मतदान का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है, इसलिए किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलती से हटना गंभीर चिंता का विषय है।


2. दस्तावेज़ी प्रक्रिया को लेकर विवाद

आलोचकों का कहना था कि कई लोगों के पास आवश्यक दस्तावेज़ आसानी से उपलब्ध नहीं होते, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों, गरीब परिवारों और विस्थापित समुदायों में।

उन्होंने कहा कि यदि दस्तावेज़ों की माँग बहुत कठोर हो, तो पात्र नागरिक भी परेशानी में पड़ सकते हैं।

चुनाव आयोग का कहना था कि सत्यापन प्रक्रिया का उद्देश्य किसी पात्र मतदाता को बाहर करना नहीं, बल्कि सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है।


3. समय और प्रक्रिया पर सवाल

कुछ विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर SIR कराने से मतदाताओं में भ्रम पैदा हो सकता है।

उनका कहना था कि इतनी बड़ी प्रक्रिया के लिए अधिक समय और व्यापक जन-जागरूकता आवश्यक थी।


4. पारदर्शिता पर बहस

कुछ नागरिक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता, सूचना देने के तरीके और शिकायत निवारण प्रणाली को लेकर चिंता व्यक्त की।

हालाँकि चुनाव आयोग ने इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार, पारदर्शी और कानूनसम्मत है।


5. राजनीतिक पक्षपात के आरोप

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया का उपयोग कुछ क्षेत्रों या समुदायों के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि SIR सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया है और इसका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है।


सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान और कानून के तहत विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का अधिकार है। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार का प्रयोग कानून के अनुसार, उचित प्रक्रिया (due process) और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ होना चाहिए, ताकि पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित न हों।

बाद में इसी निर्णय के आधार पर अन्य राज्यों में SIR से जुड़ी कुछ चुनौतियों का भी निपटारा हुआ।


निष्कर्ष

SIR विवाद ने भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने रखा—मतदाता सूची की शुद्धता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

आलोचकों का मानना है कि ऐसी प्रक्रियाओं में अत्यधिक सावधानी, पारदर्शिता और प्रभावी अपील व्यवस्था आवश्यक है, ताकि कोई भी पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न हो। विपक्षी पार्टियों ने भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि बिहार ,हरियाणा और बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को जिताने के लिए  SIR का गलत उपयोग किया गया है |

इसी कारण SIR का मुद्दा हाल के वर्षों में मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले चुनावी विवादों में से एक बन गया।


14. नीट (NEET-UG) पेपर लीक विवाद – 22 छात्रों की मौत का जिम्मेदार कौन ?

भारत में हर वर्ष लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) देते हैं। यह देश की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है।

लेकिन 2024 में NEET-UG परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद पेपर लीक, असामान्य अंक, ग्रेस मार्क्स और परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर पूरे देश में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। लाखों छात्रों और अभिभावकों ने निष्पक्ष जांच की मांग की। विपक्ष ने इसे मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे बड़ी परीक्षा संबंधी विफलताओं में से एक बताया। सरकार ने आरोपों को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कराई, कई गिरफ्तारियाँ हुईं और मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपा गया। साथ ही परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए नए कदमों की घोषणा की गई। लेकिन साक्ष्यों के अभाव में  धीरे-धीरे सारे आरोपी बरी होते गए |  जुलाई 2026 में मुख्य आरोपी संजीव मुखिया को  भी बरी कर दिया गया | हद तो तब हो गई जब मई 2026 में NEET-UG परीक्षा पेपर फिर से लीक हो गया | करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ा यह मामला धीरे-धीरे केवल एक परीक्षा का विवाद नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और सरकारी जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन गया।


विवाद कैसे शुरू हुआ?

विवाद की शुरुआत तब हुई जब NEET-UG 2026 परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आए। परीक्षा रद्द करनी पड़ी और लाखों छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। वर्षों की मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों में भारी निराशा फैल गई। निराशा और मानसिक तनाव की वजह से देश भर से करीब 22 स्टूडेंट्स के सुसाइड करने की खबरे आई|  इन घटनाओं  ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए | छात्रों के आक्रोश ने आजादी के बाद के सबसे बड़े जन-आंदोलन को जन्म दे दिया| देखते ही देखते हजारों युवा सड़कों पर उतर गए और प्रदर्शन करने लगे|


आलोचक इसे मोदी सरकार की बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. जंतर-मंतर पर gen- z  का प्रदर्शन

पेपर लीक के बाद सोशल मीडिया पर छात्रों का गुस्सा तेजी से फैलने लगा। धीरे-धीरे यह विरोध प्रदर्शन सड़कों तक पहुंचा। विभिन्न छात्र संगठनों के साथ Cockroach Janta Party (CJP) भी इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरी। आंदोलन की मुख्य मांगें थीं—

  • पेपर लीक की निष्पक्ष जांच
  • दोषियों पर कठोर कार्रवाई
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार
  • शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

इन मांगों ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। दिल्ली का जंतर-मंतर इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। एक महीने तक हजारों छात्र और युवा भयंकर गर्मी और बारिश में यहां लगातार प्रदर्शन करते रहे। कई दिनों तक धरना, रैली और विरोध सभाएं आयोजित हुईं। लेकिन मोदी सरकार पर कोई असर नही पड़ा | सरकार ने बातचीत की कोई पहल नहीं की|  देशभर में  मोदी सरकार के इस तानाशाही रवैये की काफी आलोचना हुई|

2. सोनम वांगचुक का अनशन

आंदोलन को नया मोड़ तब मिला जब पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पहुंचे और छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए। इससे आंदोलन को व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ध्यान मिला। कई सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों ने भी छात्रों की मांगों का समर्थन किया। 21 दिनों तक लगातार अनशन से सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगी| उनके समर्थन में देशभर से हजारों की संख्या में लोग जंतर-मंतर पहुँचने लगे | लोगों की भीड़ देख कर सरकार की नींद खुली और 18 जुलाई 2026 को दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देकर सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठा कर अस्पताल में भर्ती कर दिया | पुलिस की इस कारवाई की काफी आलोचना हुई|

3. जंतर-मंतर बना पुलिस हिंसा का गवाह 

 मोदी सरकार ने सोचा होगा कि सोनम वांगचुक के हटने के बाद भीड़ कम हो जाएगी लेकिन हुआ इसका उल्टा| केंद्र सरकार के इस रुख से लोगों का आक्रोश और भड़क उठा| भीड़ और बढ़ने लगी |  दिल्ली का जंतर-मंतर इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। कई दिनों तक धरना, रैली और विरोध सभाएं आयोजित हुईं।  20 जुलाई को आयोजित संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों नें गृह मंत्रालय के आदेश पर हजारों प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस के गोले छोड़े, क्रूरता से लाठी चार्ज किया और पैलेट गन चलाये| जिसमें सैकड़ों लोग घायल हुए| इस पुलिसिया कारवाई के लिए देशभर में मोदी सरकार की काफी आलोचना हुई| लोगों ने इस दिन को ब्लैक डे के रूप में मनाया |


4. NTA की कार्यप्रणाली पर सवाल

NEET आयोजित करने वाली संस्था National Testing Agency (NTA) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठे। आलोचकों ने NTA को बर्खास्त करने की मांग की|


5. बार-बार परीक्षा घोटालों का आरोप

20 जुलाई के पुलिस हिंसा के बावजूद आंदोलन खत्म नहीं हुआ | लगातार पुलिसिया कारवाई के बाद भी आंदोलनकारी जंतर-मंतर से हटने को तैयार नहीं थे| स्टूडेंट्स पर पुलिस हिंसा के विरोध में राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल,  अखिलेश यादव और भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के साथ पूरा विपक्ष सड़क पर उतर गया| विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।

लगातार बढ़ते तनाव की वजह से आखिरकार सरकार ने थोड़ी नरमी दिखाई और बातचीत की पहल की | सरकार ने परीक्षा सुरक्षा मजबूत करने और दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन विपक्ष और आंदोलनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ गए |


6.सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर सवाल

जंतर-मंतर पर आंदोलनकारियों पर पुलिस हिंसा के विरोध में समाजसेवी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पुलिस कारवाई को रोकने की मांग की| लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया | इससे भारतीय न्याय प्रणाली पर भी सवाल उठे | विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत पर सरकार से मिलीभगत का आरोप लगाया |


7. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

लगातार विरोध, राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश के बीच अंततः धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम माना गया। इस्तीफे के बाद भी कई छात्र संगठनों ने कहा कि उनकी लड़ाई केवल एक मंत्री के इस्तीफे की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली में सुधार की है।


निष्कर्ष

पेपर लीक विवाद ने यह दिखाया कि भारत में शिक्षा और रोजगार केवल नीतिगत मुद्दे नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। जब प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। 2026 का यह आंदोलन भारतीय राजनीति में युवाओं की बढ़ती भूमिका और शिक्षा सुधार की मांग का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

इसी कारण NEET पेपर लीक विवाद मोदी सरकार के कार्यकाल के सबसे चर्चित शिक्षा संबंधी विवादों में से एक माना जाता है।

15. कोविड-19 की दूसरी लहर और ऑक्सीजन संकट – अभूतपूर्व आपदा या तैयारी में बड़ी कमी?

साल 2021 में भारत ने कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर का सामना किया, जिसे देश के आधुनिक इतिहास की सबसे गंभीर स्वास्थ्य आपदाओं में से एक माना जाता है। इस दौरान अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, ऑक्सीजन की भारी मांग, दवाओं की कमी और बड़ी संख्या में मौतों ने पूरे देश को झकझोर दिया।

सरकार का कहना है कि दूसरी लहर अत्यंत अप्रत्याशित थी और दुनिया के कई विकसित देश भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुए। सरकार ने ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने, रेलवे और वायुसेना के माध्यम से आपूर्ति करने, नए अस्पताल बनाने और दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाने का दावा किया।

वहीं विपक्ष और आलोचकों का कहना है कि दूसरी लहर के दौरान तैयारी पर्याप्त नहीं थी और कई जानें बेहतर योजना तथा समय पर संसाधन उपलब्ध होने से बचाई जा सकती थीं।


दूसरी लहर इतनी भयावह क्यों थी?

2021 की शुरुआत में संक्रमण अपेक्षाकृत कम हो गया था। लेकिन मार्च–अप्रैल 2021 से मामलों में अचानक विस्फोटक वृद्धि हुई।

कुछ ही हफ्तों में—

  • लाखों नए मामले सामने आने लगे।
  • अस्पतालों में बेड कम पड़ गए।
  • ऑक्सीजन सिलेंडरों की भारी कमी हो गई।
  • ICU और वेंटिलेटर पर दबाव बढ़ गया।
  • श्मशानों और कब्रिस्तानों पर अभूतपूर्व दबाव देखने को मिला।

आलोचक इसे मोदी सरकार की बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. ऑक्सीजन संकट

दूसरी लहर की सबसे बड़ी तस्वीर ऑक्सीजन की कमी थी।

देश के कई अस्पतालों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनके पास केवल कुछ घंटों की ऑक्सीजन बची है।

कई अस्पतालों ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया।

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कई अन्य राज्यों में ऑक्सीजन आपूर्ति को लेकर गंभीर संकट देखने को मिला।

आलोचकों का कहना था कि यदि पहले से पर्याप्त ऑक्सीजन उत्पादन और वितरण की तैयारी होती तो अनेक जानें बच सकती थीं।


2. कुंभ और चुनावी रैलियों पर सवाल

आलोचकों ने आरोप लगाया कि दूसरी लहर के दौरान भी बड़े धार्मिक आयोजन और विशाल चुनावी रैलियाँ जारी रहीं।

उनका कहना था कि इससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ा।

विशेष रूप से—

  • हरिद्वार कुंभ।
  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की बड़ी रैलियाँ।

इन दोनों को लेकर सरकार की काफी आलोचना हुई।


3. स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी

आलोचकों का कहना था कि पहली लहर के बाद सरकार के पास तैयारी का पर्याप्त समय था।

उनके अनुसार—

  • ऑक्सीजन प्लांट समय पर नहीं बने।
  • अस्पतालों की क्षमता पर्याप्त नहीं बढ़ाई गई।
  • दवाओं की उपलब्धता कमजोर रही।

सरकार का कहना है कि दूसरी लहर की तीव्रता अनुमान से कहीं अधिक थी और स्वास्थ्य ढाँचे का अभूतपूर्व विस्तार बहुत कम समय में करना पड़ा।


4. मौतों के आंकड़ों पर विवाद

कुछ विपक्षी दलों, शोधकर्ताओं और मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि कोविड से हुई वास्तविक मौतों की संख्या आधिकारिक आँकड़ों से बहुत अधिक हो सकती है।

आलोचकों ने अतिरिक्त मृत्यु (Excess Mortality) के आधार पर सवाल उठाए।

सरकार ने इन दावों से असहमति जताई और कहा कि कोविड से होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार की गई।


5. प्रवासी मजदूरों की कठिनाइयाँ

हालाँकि प्रवासी मजदूरों का सबसे बड़ा संकट 2020 के लॉकडाउन के दौरान सामने आया था, लेकिन दूसरी लहर में भी कई राज्यों में रोजगार और आवाजाही को लेकर कठिनाइयाँ बनी रहीं।

आलोचकों का कहना था कि सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत होना चाहिए था।


6. टीकाकरण नीति पर शुरुआती भ्रम

2021 में टीकाकरण नीति को लेकर भी बहस हुई।

कुछ समय तक राज्यों और केंद्र के बीच वैक्सीन खरीद की अलग-अलग व्यवस्था रही।

आलोचकों ने इसे भ्रमित करने वाली नीति बताया।

बाद में केंद्र सरकार ने वैक्सीन खरीद को अपने हाथ में लेकर सभी राज्यों को आपूर्ति की व्यवस्था की।


निष्कर्ष

कोविड-19 की दूसरी लहर भारत के लिए एक ऐसी त्रासदी थी जिसने लाखों परिवारों को प्रभावित किया।

आलोचकों का मानना है कि बेहतर तैयारी, ऑक्सीजन प्रबंधन और समय पर निर्णयों से नुकसान कम किया जा सकता था। वहीं सरकार का तर्क है कि यह वैश्विक महामारी की अभूतपूर्व लहर थी, जिसमें दुनिया के कई विकसित देश भी गंभीर चुनौतियों से जूझे, और भारत ने सीमित समय में स्वास्थ्य ढाँचे का बड़े पैमाने पर विस्तार किया।

इसी कारण कोविड-19 की दूसरी लहर और ऑक्सीजन संकट मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे अधिक चर्चा और आलोचना वाले अध्यायों में शामिल किए जाते हैं।


16. अग्निपथ योजना – सेना में सुधार या युवाओं के भविष्य पर बड़ा प्रयोग?

साल 2022 में केंद्र सरकार ने भारतीय सशस्त्र बलों में भर्ती की नई व्यवस्था अग्निपथ योजना शुरू की। इस योजना के तहत भर्ती होने वाले सैनिकों को “अग्निवीर” कहा गया। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य सेना को अधिक युवा, आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना तथा रक्षा पेंशन के बढ़ते बोझ को कम करना था।

हालाँकि योजना की घोषणा के तुरंत बाद देश के कई राज्यों में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। विशेष रूप से उन युवाओं ने विरोध किया जो वर्षों से पारंपरिक सेना भर्ती की तैयारी कर रहे थे। विपक्ष ने इसे मोदी सरकार के सबसे विवादित फैसलों में से एक बताया।


अग्निपथ योजना क्या है?

इस योजना के तहत—

  • युवाओं की भर्ती लगभग 4 वर्ष के लिए की जाती है।
  • इस अवधि के बाद अधिकतम 25% अग्निवीरों को नियमित सेवा में रखा जाता है।
  • शेष लगभग 75% अग्निवीर सेवा पूरी होने के बाद सेना से बाहर हो जाते हैं।
  • बाहर होने वाले अग्निवीरों को एकमुश्त ‘सेवा निधि’ (Seva Nidhi) राशि दी जाती है, लेकिन उन्हें नियमित सैनिकों जैसी आजीवन पेंशन नहीं मिलती।

सरकार का कहना है कि इससे सेना अधिक युवा बनेगी और भविष्य की युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार होगी।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. केवल चार वर्ष की सेवा

सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि केवल चार वर्ष की सेवा के बाद अधिकांश अग्निवीरों को सेना छोड़नी पड़ेगी।

आलोचकों का कहना था कि वर्षों से सेना में स्थायी करियर का सपना देखने वाले युवाओं के लिए यह बड़ा झटका था।

उनका तर्क था कि सेना केवल नौकरी नहीं बल्कि दीर्घकालिक सेवा और जीवनभर का करियर मानी जाती रही है।


2. 75% अग्निवीरों के भविष्य को लेकर चिंता

आलोचकों का कहना था कि चार वर्ष बाद बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवा रोजगार की तलाश करेंगे।

उन्होंने पूछा कि—

  • क्या सभी को पर्याप्त रोजगार मिलेगा?
  • क्या उनके लिए पर्याप्त आरक्षण या पुनर्वास व्यवस्था है?
  • यदि रोजगार नहीं मिला तो उनका भविष्य क्या होगा?

3. सेना की युद्ध क्षमता पर सवाल

कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों और रक्षा विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि कम अवधि की सेवा से सैनिकों के अनुभव और इकाइयों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

हालाँकि कई अन्य पूर्व सैन्य अधिकारियों ने योजना का समर्थन भी किया और कहा कि आधुनिक सेनाओं में इस प्रकार के मॉडल सफलतापूर्वक अपनाए गए हैं।


4. व्यापक विरोध प्रदर्शन

योजना की घोषणा के बाद बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और कई अन्य राज्यों में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए।

कुछ स्थानों पर—

  • ट्रेनों में आगजनी हुई।
  • रेलवे संपत्ति को नुकसान पहुँचा।
  • सार्वजनिक संपत्ति को क्षति हुई।

आलोचकों ने कहा कि यह विरोध दर्शाता है कि सरकार ने योजना लागू करने से पहले पर्याप्त संवाद नहीं किया।


5. पहले से तैयारी कर रहे युवाओं की निराशा

कई युवा वर्षों से पारंपरिक सेना भर्ती प्रक्रिया की तैयारी कर रहे थे।

उनका कहना था कि अचानक भर्ती प्रणाली बदल जाने से उनकी वर्षों की योजना प्रभावित हुई।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार को परिवर्तन धीरे-धीरे लागू करना चाहिए था।


6. सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

कुछ विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की कि यदि बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवा चार वर्ष बाद अस्थिर रोजगार की स्थिति में होंगे, तो इससे सामाजिक चुनौतियाँ भी पैदा हो सकती हैं।

हालाँकि इस विषय पर अलग-अलग विशेषज्ञों की राय रही है और इस संबंध में कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है।


निष्कर्ष

अग्निपथ योजना मोदी सरकार के सबसे विवादित सुधारों में भी शामिल रही है।

आलोचकों का मानना है कि योजना ने लाखों युवाओं की रोजगार संबंधी अपेक्षाओं को प्रभावित किया और इसके दीर्घकालिक परिणामों को लेकर अभी भी कई प्रश्न बने हुए हैं। वहीं सरकार का कहना है कि बदलती युद्ध आवश्यकताओं और वित्तीय वास्तविकताओं को देखते हुए यह सुधार आवश्यक था और समय के साथ इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।

इसी कारण अग्निपथ योजना मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे चर्चित और बहस का विषय बनी रहने वाली नीतियों में से एक है।


17. चीन सीमा विवाद और गलवान संघर्ष – राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती या कूटनीतिक और सामरिक विफलता?

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दशकों से समय-समय पर तनाव रहा है। लेकिन 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के संबंधों को एक नए मोड़ पर ला दिया।

इस संघर्ष में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि चीन ने बाद में अपने 4 सैनिकों के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि की। कई स्वतंत्र विश्लेषकों ने चीन के वास्तविक नुकसान इससे अधिक होने की संभावना जताई, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई।

गलवान घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में गहरा तनाव पैदा हुआ। दोनों देशों ने सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात किए। इसके बाद कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएँ हुईं तथा कुछ क्षेत्रों से चरणबद्ध तरीके से सैनिक पीछे भी हटे।

आलोचकों का कहना है कि यह घटना मोदी सरकार की विदेश और सुरक्षा नीति की बड़ी परीक्षा थी, जबकि सरकार का कहना है कि भारतीय सेना ने बहादुरी से जवाब दिया और भारत की संप्रभुता की रक्षा की।


गलवान संघर्ष क्या था?

15 जून 2020 की रात भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई।

दोनों देशों के बीच पहले से तनाव था, क्योंकि सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ रही थी।

विशेष बात यह थी कि दोनों पक्षों ने आग्नेयास्त्रों का उपयोग नहीं किया। संघर्ष में डंडों, लोहे की छड़ों और अन्य वस्तुओं का इस्तेमाल हुआ।

यह लगभग 45 वर्षों बाद पहली बार था जब भारत-चीन सीमा पर सैनिकों की जान गई।


आलोचक इसे मोदी सरकार की बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. सीमा पर तनाव बढ़ने से रोकने में विफलता

आलोचकों का कहना है कि यदि समय रहते बेहतर कूटनीतिक और सैन्य रणनीति अपनाई जाती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।

उनका तर्क है कि सीमा पर लंबे समय तक तनाव बने रहने से यह संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट गहरा गया।

सरकार का कहना है कि चीन की गतिविधियाँ भारत के नियंत्रण से बाहर थीं और भारतीय सेना ने हर चुनौती का दृढ़ता से सामना किया।


2. चीनी घुसपैठ के आरोप

विपक्ष ने आरोप लगाया कि चीन ने भारतीय दावे वाले कुछ क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत की और भारत को नुकसान हुआ।

सरकार ने कहा कि भारत की किसी भी भूमि पर स्थायी कब्जा नहीं होने दिया गया और भारतीय सेना ने सीमा की रक्षा पूरी मजबूती से की।

यह विषय राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहा, क्योंकि दोनों पक्षों ने अलग-अलग दावे किए।


3. प्रधानमंत्री के बयान पर विवाद

गलवान घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक बयान—जिसमें उन्होंने कहा कि “न कोई हमारी सीमा में घुसा है, न कोई घुसा हुआ है”—को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए।

आलोचकों का कहना था कि इस बयान से भ्रम पैदा हुआ और चीन को कूटनीतिक लाभ मिल सकता था।

बाद में सरकार ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी गलवान की तत्काल स्थिति के संदर्भ में थी और भारत अपनी सीमा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


4. चीन के साथ व्यापार

आलोचकों ने यह भी प्रश्न उठाया कि सीमा विवाद और तनाव के बावजूद भारत और चीन के बीच व्यापार का स्तर कई वर्षों तक ऊँचा बना रहा।

उनका तर्क था कि यदि चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती माना जाता है, तो आर्थिक निर्भरता कम करने की दिशा में और तेज़ कदम उठाए जाने चाहिए थे।


5. सैन्य तैयारी पर बहस

कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि सीमा पर बुनियादी ढाँचे, सड़कें, निगरानी और रसद क्षमता को और पहले मजबूत किया जाना चाहिए था।

हालाँकि कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हाल के वर्षों में भारत ने सीमा क्षेत्रों में सड़क, पुल, सुरंग और हवाई पट्टियों के निर्माण में पहले की तुलना में काफी तेजी दिखाई है।


6. सीमा विवाद का लंबा खिंचना

गलवान के बाद कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएँ हुईं।

कुछ क्षेत्रों में सैनिक पीछे हटे, लेकिन कुछ स्थानों पर लंबे समय तक तनाव बना रहा।

आलोचकों का कहना था कि सीमा विवाद का शीघ्र समाधान नहीं हो सका।


निष्कर्ष

गलवान संघर्ष मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों में से एक था।

आलोचकों का मानना है कि सीमा पर तनाव, चीन के साथ संबंधों और सरकारी बयानों को लेकर कई सवाल अब भी बने हुए हैं। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि भारतीय सेना ने अद्वितीय साहस का प्रदर्शन किया, सीमा की रक्षा की और भविष्य में ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए सैन्य एवं बुनियादी ढाँचे को और मजबूत बनाया।

इसी कारण गलवान और चीन सीमा विवाद मोदी सरकार की सबसे चर्चित और बहस का विषय बनी घटनाओं में शामिल है।


18. महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता – तेज़ विकास का दावा या आम लोगों पर बढ़ता आर्थिक दबाव?

किसी भी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है कि उसके कार्यकाल में आम नागरिक की आर्थिक स्थिति कैसी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा, लेकिन इसी दौरान महंगाई, बेरोज़गारी, आय असमानता और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों पर भी लगातार बहस होती रही।

सरकार का कहना है कि वैश्विक महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट के बावजूद भारत ने मजबूत आर्थिक विकास बनाए रखा। दूसरी ओर विपक्ष और आलोचकों का कहना है कि आर्थिक विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचे और आम परिवारों पर जीवन-यापन का खर्च बढ़ा।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. बेरोज़गारी का मुद्दा

मोदी सरकार की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक रोजगार का मुद्दा रहा है।

आलोचकों का कहना है कि—

  • बड़ी संख्या में शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में हैं।
  • सरकारी नौकरियों की भर्तियों में देरी और परीक्षा विवादों ने युवाओं की चिंता बढ़ाई।
  • कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों ने भरोसे को प्रभावित किया।
  • पर्याप्त गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित नहीं हो पाए।

2. महंगाई

आलोचकों का कहना है कि पिछले वर्षों में—

  • खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हुई।
  • रसोई गैस (LPG) की कीमतों को लेकर लंबे समय तक असंतोष रहा।
  • पेट्रोल और डीज़ल के दाम कई अवधियों में ऊँचे रहे।
  • आम परिवारों का मासिक खर्च बढ़ा।

विशेष रूप से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग ने दैनिक खर्चों में बढ़ोतरी की शिकायत की।


3. आय असमानता

कुछ अर्थशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह तर्क दिया गया कि भारत में संपत्ति और आय का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत कम लोगों के पास केंद्रित होता गया।

आलोचकों का कहना है कि आर्थिक विकास के लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुए।

सरकार का तर्क है कि करोड़ों लोगों को बैंक खाते, शौचालय, बिजली, आवास, मुफ्त राशन, जल कनेक्शन और डिजिटल सेवाओं जैसी सुविधाएँ मिलीं, जिससे गरीबों का जीवन स्तर बेहतर हुआ।


4. किसानों और छोटे व्यापारियों की आय

विपक्ष ने आरोप लगाया कि—

  • खेती की लागत बढ़ी।
  • छोटे व्यापारियों को बढ़ती लागत और प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
  • कई सूक्ष्म और लघु उद्योगों पर आर्थिक दबाव बढ़ा।

सरकार का कहना है कि PM-KISAN, मुद्रा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, डिजिटल भुगतान और MSME सहायता जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों और छोटे व्यवसायों को समर्थन दिया गया।


5. युवाओं का बढ़ता असंतोष

प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, भर्ती प्रक्रियाओं की लंबी अवधि, पेपर लीक और सीमित सरकारी नौकरियों को लेकर कई राज्यों में युवाओं ने प्रदर्शन किए।

आलोचकों का कहना है कि रोजगार और भर्ती व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।


6. आर्थिक विकास बनाम जीवन स्तर

सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है।

आलोचकों का कहना है कि GDP वृद्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन आम नागरिक की आय, रोजगार, महंगाई और क्रय-शक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


निष्कर्ष

महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार की सबसे अधिक आलोचना हुई है। आलोचकों का कहना है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचा और रोजगार सृजन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि उसने वैश्विक संकटों के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखा, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचा विकसित किया और गरीबों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ लागू कीं।

इसी कारण आर्थिक प्रदर्शन पर मोदी सरकार का मूल्यांकन आज भी भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।


19. मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें – वैश्विक चिंता या भारत की गलत छवि?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर देश और विदेश में व्यापक बहस हुई। कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने अपनी वार्षिक रिपोर्टों में भारत की रैंकिंग और स्थिति पर चिंता व्यक्त की। वहीं भारत सरकार ने इन रिपोर्टों की पद्धति (Methodology) और निष्कर्षों पर सवाल उठाते हुए उन्हें पक्षपातपूर्ण और भारत की वास्तविक स्थिति से मेल न खाने वाला बताया।

इस कारण यह विषय मोदी सरकार की सबसे अधिक चर्चित आलोचनाओं में शामिल रहा।


आलोचक इसे बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (Press Freedom Index)

अंतरराष्ट्रीय संगठन Reporters Without Borders (RSF) की वार्षिक World Press Freedom Index में पिछले वर्षों के दौरान भारत की रैंकिंग अपेक्षाकृत नीचे रही।

आलोचकों का कहना है कि यह दर्शाता है कि पत्रकारों को काम करते समय दबाव, कानूनी चुनौतियों या सुरक्षा संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ता है।

कुछ पत्रकार संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर विभिन्न कानूनों या जांच एजेंसियों के माध्यम से दबाव बनाया जाता है।


2. पत्रकारों की गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई

कुछ मामलों में पत्रकारों, डिजिटल मीडिया संचालकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर विभिन्न कानूनों के तहत कार्रवाई हुई।

आलोचकों का कहना है कि इससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और कुछ पत्रकार आत्म-सेंसरशिप (Self-censorship) अपनाने लगते हैं।

सरकार का कहना है कि किसी भी कार्रवाई का संबंध पत्रकारिता से नहीं, बल्कि यदि कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाती है।


3. इंटरनेट बंद (Internet Shutdowns)

भारत में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के कारण समय-समय पर इंटरनेट सेवाएँ निलंबित की गई हैं।

आलोचकों का कहना है कि लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहने से—

  • शिक्षा,
  • व्यापार,
  • स्वास्थ्य सेवाएँ,
  • पत्रकारिता,
  • और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और कुछ अन्य क्षेत्रों में लंबे इंटरनेट प्रतिबंधों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा हुई।


4. लोकतंत्र सूचकांकों में भारत की स्थिति

कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थानों—जैसे Varieties of Democracy (V-Dem) और Freedom House—ने अपनी रिपोर्टों में भारत के लोकतांत्रिक वातावरण को लेकर चिंता जताई।

इन रिपोर्टों में चुनावी माहौल, नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और संस्थागत स्वतंत्रता जैसे विषयों का उल्लेख किया गया।


5. सार्वजनिक प्रसारक और मीडिया पर बहस

आलोचकों का कहना है कि मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के प्रति अपेक्षाकृत अनुकूल रुख अपनाता है और सरकार की आलोचना कम करता है।

उनका तर्क है कि लोकतंत्र में मीडिया का काम सत्ता से सवाल पूछना है। लेकिन भारत की मीडिया सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसका बचाव करती है |


6. सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म

सरकार ने आईटी नियम (IT Rules) और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े नए नियम लागू किए।

आलोचकों का कहना था कि इन नियमों से ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।


निष्कर्ष

मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठे सवाल मोदी सरकार के कार्यकाल के सबसे चर्चित राजनीतिक और वैचारिक विवादों में से एक रहे हैं।

आलोचकों का मानना है कि लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र मीडिया, मजबूत संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं से भी तय होती है। वहीं सरकार का कहना है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहाँ मीडिया, न्यायपालिका और चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग भारत की वास्तविक स्थिति का पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करतीं।

इसी कारण यह मुद्दा मोदी सरकार के समर्थकों और आलोचकों के बीच सबसे अधिक बहस का विषय बना हुआ है।


20. ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट – भारत का रणनीतिक सपना या पर्यावरण और आदिवासियों के भविष्य पर बड़ा खतरा?

ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट (Great Nicobar Project) मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक है। इस परियोजना का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक (Strategic) स्थिति को मजबूत करना, वैश्विक समुद्री व्यापार में भारत की भूमिका बढ़ाना और ग्रेट निकोबार द्वीप को एक बड़े आर्थिक एवं लॉजिस्टिक हब के रूप में विकसित करना है। परियोजना में अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, दोहरे उपयोग (नागरिक एवं सैन्य) वाला हवाई अड्डा, टाउनशिप, बिजली संयंत्र और अन्य आधारभूत संरचनाएँ शामिल हैं।

सरकार का कहना है कि यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा और आर्थिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर पर्यावरणविदों, कुछ वैज्ञानिकों, आदिवासी अधिकार समूहों और विपक्ष ने इसे हाल के वर्षों की सबसे विवादास्पद विकास परियोजनाओं में से एक बताया है।


ग्रेट निकोबार परियोजना क्या है?

इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹72,000 करोड़ (प्रारंभिक अनुमान) बताई गई थी। इसके प्रमुख घटक हैं—

  • अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट।
  • नागरिक एवं सैन्य उपयोग वाला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा।
  • नया टाउनशिप।
  • बिजली संयंत्र।
  • सड़क एवं अन्य आधारभूत संरचना।

सरकार का कहना है कि मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के निकट स्थित होने के कारण यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यधिक रणनीतिक महत्व रखता है।


आलोचक इसे मोदी सरकार की बड़ी गलती क्यों मानते हैं?

1. बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई

पर्यावरणविदों का कहना है कि इस परियोजना के लिए विशाल क्षेत्र के प्राकृतिक वर्षावनों को प्रभावित किया जाएगा।

उनका तर्क है कि यह भारत के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है।

आलोचकों के अनुसार इतनी बड़ी वन कटाई का प्रभाव दशकों तक रह सकता है।


2. दुर्लभ वन्यजीवों पर खतरा

ग्रेट निकोबार कई दुर्लभ प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है।

विशेष रूप से—

  • Leatherback Turtle के घोंसले बनाने वाले तट,
  • दुर्लभ पक्षी,
  • प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs),
  • मैंग्रोव,
  • उष्णकटिबंधीय वर्षावन।

आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य से इन पारिस्थितिक तंत्रों को स्थायी नुकसान पहुँच सकता है।


3. शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों पर प्रभाव

ग्रेट निकोबार में रहने वाली शोम्पेन (Shompen) और निकोबारी (Nicobarese) समुदायों को लेकर भी गंभीर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।

आलोचकों का कहना है कि—

  • उनके पारंपरिक जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • बाहरी आबादी बढ़ने से सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है।
  • आदिवासी अधिकारों और सहमति की प्रक्रिया पर प्रश्न उठे हैं।

4. पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) पर सवाल

कई पर्यावरण विशेषज्ञों और संगठनों ने आरोप लगाया कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) पर्याप्त नहीं था और कुछ मंजूरियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए।

इसी आधार पर परियोजना को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और अन्य मंचों पर कानूनी चुनौतियाँ दी गईं।


5. भूकंप और सुनामी का जोखिम

ग्रेट निकोबार भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है।

आलोचकों का कहना है कि—

  • 2004 की सुनामी ने इस क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।
  • इतनी बड़ी आबादी और विशाल अवसंरचना विकसित करने से प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम भी ध्यान में रखना होगा।

6. विकास मॉडल पर बहस

पर्यावरणविदों का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन इतने संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण की बजाय अधिक टिकाऊ (Sustainable) मॉडल अपनाया जाना चाहिए।


सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि—

  • यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
  • भारत को सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
  • रोजगार, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।
  • परियोजना को आवश्यक वैधानिक मंजूरियाँ दी गई हैं और पर्यावरण संरक्षण के लिए शर्तें भी लगाई गई हैं।

सरकार का यह भी कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।


निष्कर्ष

ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट भारत के सामने एक कठिन नीति-प्रश्न प्रस्तुत करता है—क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए इतनी बड़ी परियोजना आवश्यक है, या इसके पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणाम बहुत अधिक हो सकते हैं?

आलोचकों का मानना है कि परियोजना से जैव-विविधता, आदिवासी समुदायों और संवेदनशील पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति पहुँचने का जोखिम है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति, व्यापारिक क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसी कारण ग्रेट निकोबार परियोजना मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे चर्चित और सबसे विवादित विकास परियोजनाओं में से एक मानी जाती है।


निष्कर्ष: मोदी सरकार की 20 सबसे बड़ी आलोचनाएँ – लोकतंत्र में सवाल भी ज़रूरी, जवाब भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित, प्रभावशाली और विवादास्पद राजनीतिक दौरों में से एक माना जाता है। एक ओर उनकी सरकार ने डिजिटल इंडिया, आधारभूत ढाँचे का तेज़ विस्तार, जी-20 की मेजबानी, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, कल्याणकारी योजनाओं, रक्षा आधुनिकीकरण और तकनीकी विकास जैसे क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण पहल कीं। दूसरी ओर उनके कार्यकाल में ऐसे कई निर्णय और घटनाएँ भी सामने आईं, जिन पर विपक्ष, विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और नागरिक समाज ने गंभीर सवाल उठाए।

इस लेख में जिन 20 प्रमुख मुद्दों की चर्चा की गई, वे केवल राजनीतिक आरोप नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे विषय हैं जिन पर वर्षों से सार्वजनिक बहस होती रही है। इनमें नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी, किसान आंदोलन, अनुच्छेद 370, CAA-NRC, मणिपुर हिंसा, चुनावी बॉन्ड, पेगासस विवाद, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, विदेश नीति, महिला पहलवानों का आंदोलन, मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR), NEET पेपर लीक, कोविड-19 की दूसरी लहर, अग्निपथ योजना, चीन सीमा विवाद, महंगाई और आर्थिक असमानता, मीडिया की स्वतंत्रता तथा ग्रेट निकोबार परियोजना जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इसके अलावा E 20 पेट्रोल, डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना, बढ़ती हुई खुदरा महंगाई और सरकार के तानाशाही रवैयों की वजह से पूरे देश में मोदी सरकार  की आलोचना हो रही है। 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष मीडिया, पारदर्शी शासन, जवाबदेह सरकार और जागरूक नागरिकों से तय होती है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।

अंततः, इस लेख का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या नेता के पक्ष या विपक्ष में निर्णय देना नहीं, बल्कि उन प्रमुख आलोचनाओं को एक स्थान पर तथ्यात्मक और संतुलित रूप में प्रस्तुत करना है, जिन पर भारत में व्यापक सार्वजनिक चर्चा हुई है। अंतिम निर्णय हमेशा पाठक का होना चाहिए—तथ्यों, तर्कों और अपने विवेक के आधार पर।

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